
नास्त्यत्र नियतः कश्चिद्युक्ति स्वानुभवागमात् ।
मन्दादिरुदयस्तेषां सूर्युपाध्यायसाधुषु ॥697॥
प्रत्येकं बहवः सन्ति सूर्युपाध्यायसाधवः ।
जघन्यमध्यमोत्कृष्टभावेश्चैकैकशः पृथक् ॥698॥
कश्चित्सूरिः कदाचिद्वै विशुद्धिं परमां गतः ।
मध्यमां वा जघन्यां वा विशुद्धिं पुनराश्रयेत् ॥699॥
हेतुस्तत्रोदिता नानाभावांशै: स्पर्धकाः क्षणम् ।
धर्मादेशोपदेशादि हेतुर्नात्र बहि: क्वचित् ॥700॥
परिपाठ्यानया योज्याः पाठकाः साधवश्च ये ।
न विशेषो यतस्तेषां न्यायाच्छेषोऽविशेषभाक् ॥701॥
अन्वयार्थ : इन आचार्य, उपाध्याय और साथु के कषायों का कोई भी मन्दादि उदय नियत नहीं है । युक्ति, स्वानुभव और आगम से तो यही ज्ञात होता है कि इनके कैसे भी अंशो का उदय होता है ॥६०७॥ आचार्य, उपाध्याय और साधु इनमें से प्रत्येक के अनेक भेद हैं जो पृथक-पृथक एक-एक के जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट भावों की अपेक्षा से प्राप्त होते हैं ॥६०८॥ कोई आचार्य कदाचित उत्कृष्ट विशुद्धि को प्राप्त होकर फिर मध्यम या जघन्य विशुद्धि को प्राप्त होता है ॥६०९॥ नाना अविभाग प्रतिच्छेदों को लिये हुए प्रति-समय उदय में आने वाले संज्वलन-कषाय के देशघाती स्पर्धक ही इसका कारण हैं, धर्म का आदेश या उपदेश आदि रूप बाह्य-क्रिया इसका कारण नहीं है ॥७००॥ जिस परिपाटी से आचार्यों के भेद बतलाय हैं इसी परिपाटी से उपाध्याय और साधुओं के भेद भी घटित कर लेने चाहिये क्योंकि युक्ति से विचार करने पर आचार्य से इनमें अन्तरंग में और कोई विशेषता शेष नहीं रहती; वे तीनों समान हैं ॥७०१॥