नैवमर्थाद्यतः सर्व वस्त्वकिन्चित्करं वहि: ।
तत्पदं फलवन्मोहादिच्छतोऽर्थान्तरं परम् ॥703॥
किं पुनर्गणिनस्तस्य सर्वतोऽनिच्छतो बहिः ।
धर्मादेशोपदेशादि स्वपदं तत्फलं च यत्‌ ॥704॥
नास्यासिद्धं निरीहत्वं घर्मादेशादि कर्मणि ।
न्यायादक्षार्थकांक्षाया ईहा नान्यत्र जातुचित्‌ ॥705॥
अन्वयार्थ : ऐसा कहना ठीक नहीं हैं क्‍योंकि समस्त बाह्य पदार्थ वास्तव में अकिंचित्कर हैं । अब यदि मोहवश कोई पर-पदार्थ को निज मानता है तो इसके लिये ये आचार्य आदि पद अवश्य ही फलवाले हैं । अर्थात्‌ इनसे वह सांसारिक प्रयोजन की सिद्धि कर सकता है ॥७०३॥ किन्तु जो बाह्य रुप आचार्य पद और धर्म का आदेश तथा उपदेश आदि रूप उसके फल को सर्वथा नहीं चाहता है उस आचार्य का तो फिर कहना ही क्‍या है अर्थात्‌ उसकी अन्तरंग परिणति में ये बाह्य कार्य बिल्कुल ही कारण नहीं हो सकते ॥७०४॥ धर्म के आदेश आदि कार्यों में आचार्य निरीह होते हैं यह बात असिद्ध नहीं है, क्‍योंकि न्याय से इन्द्रियों के विषयों की आकांक्षा ही ईहा मानी गई है अन्यत्र की गई इच्छा कभी भी ईहा नहीं मानी गई है ॥७०५॥