
नित्ये नैमत्तिके चैवं जिनबिम्बमहोत्सवे ।
शैथिल्यं नैव कर्तव्यं तत्त्वज्ञैयस्तद्विशेषत: ॥739॥
संयमो द्विविधश्चैवं विधेयो गृहमेधिभि: ।
विनापि प्रतिमारूपं व्रतं यद्वा स्वशक्तितः ॥740॥
तपो द्वादशधा द्वेधा बाह्याभ्यन्तरभेदतः ।
कृत्स्नमन्यतमं वा तत्कार्यंचानतिवीर्यसात् ॥741॥
उक्तं दिङ्मात्रतोःप्यत्र प्रसङ्गाद्वा गृहिव्रतम् ।
वक्ष्ये चोपासकाध्यायात्सावकाशात्सविस्तरम् ॥742॥
अन्वयार्थ : इसी प्रकार श्रावक को नित्य और नैमत्तिक जिनबिम्ब- महोत्सवों में शिथिलता नहीं करनी चाहिये । तथा तत्त्व के जानकार पुरुषों को विशेषरूप से शिथिलता नहीं करनी चाहिये ॥७३९॥ इसीप्रकार गृहस्थ कों दोनों प्रकार का संयम धारण करना चाहिए । या तो प्रतिभा रूप ब्रतों को धारण करना चाहिये । या अपनी उक्त्यनुसार प्रतिमाओं के विना व्रत का धारण करना चाहिये ॥७४०॥ तप बारह प्रकार का है जो बाह्य और आभ्यन्तर के भेद से दो प्रकार का है। अपनी शक्ति को न छिपा कर इन बारह प्रकार के तपों को करना चाहिये । या इनमें से किसी एक तप को करना चाहिये ॥७४१॥ इस प्रकार यहां प्रसंगवश संक्षेप में गृहस्थों का व्रत कहा है । विस्तार से इसका कथन उपासकाध्ययन के अनुसार सावकाश आगे करेंगे ॥७४२॥