+ यति-धर्म -
यतेर्मूलगुणाश्चाष्टाविंशतिर्मूलवत्तरोः ।
नात्राप्यन्यतमेनोना नातिरिक्ताः कदाचन ॥743॥
सर्वैरेभिः समस्तैश्च सिद्धं यावन्मुनिव्रतम् ।
न व्यस्तैर्व्यस्तमात्रं तु यावदंशनयादपि ॥744॥
(उक्तञ्च)
वदसमिदिंदियरोधो लोचो आवस्सयमचेलमण्हाणं ।
खिदिसयणमदंतमणं ठिदिभोयणमेयभत्तं च ॥
एते मूलगुणाः प्रोक्ता: यतीनां जैनशासने ।
लक्षाणाम् चतुरशीतिर्गुणाश्चोत्तरसंज्ञकाः ॥745॥
अन्वयार्थ : यति के अठाईस मूलगुण होते हैं । वे ऐसे हैं जैसे कि वृक्ष का मूल होता है । कभी भी इनमें से न तो कोई कम होता है और न अधिक ही होता है ॥७४३॥ समस्तरूप इन सब गुणों के द्वारा ही पूरा मुनि-व्रत सिद्ध होता है व्यस्तरूप इन सब गुणों के द्वारा नहीं, क्‍योंकि एक अंश को ग्रहण करनेवाले नय की अपेक्षा तो वह व्यस्तरूप ही सिद्ध होता है पूरा मुनि-व्रत नहीं सिद्ध होता ॥७४४॥
कहा भी है --
पांच महाव्रत, पांच समिति, पांचों इंद्रियों का निरोध करना, केश लोंच , छह आवश्यक, नग्न रहना, स्नान नहीं करना, जमीन में सोना, दंतधावन नहीं करना, खड़े होकर आहार लेना और एक बार भोजन करना ये अठाईस मूल गुण हैं । जैनशासन में यतियों के ये मूलगण कहे हैं उनके उत्तरगुण चौरासी लाख होते हैं ॥७४५॥