
ततः सागारधर्मो वाऽनगारो वा यथोदितः ।
प्राणिसंरक्षणं मूलमुभयत्राविशेषतः ॥746॥
उक्तमस्ति क्रियारूपं व्यासाद् व्रतकदम्बकम् ।
सर्वसावद्ययोगस्य तदेकस्य निवृत्तये॥747॥
अर्थाज्जैनोपदेशोऽयमस्त्यादेशः स एव च ।
सर्व सावद्ययोगस्य निर्वृतिर्व्रतमुच्यते ॥748॥
सर्वशब्देन तत्रान्तर्बहिर्वृत्तिर्यदर्थतः ।
प्राणच्छेदो हि सावद्यं सैव हिंसा प्रकीर्तिता ॥749॥
योगस्तत्रोपयोगो वा बुद्धिपू्र्व: स उच्यते ।
सूक्ष्मश्चाबृद्धिपूर्वो यः स स्मृतो योग इत्यपि ॥750॥
तस्याभावान्निर्वृत्ति: स्याद् व्रतं वार्थादिति स्मृतिः ।
अंशात्साप्यंशतस्तत्सा सर्वत: सर्वतोऽपि तत् ॥751॥
अन्वयार्थ : इसलिये जैसा सागार धर्म कहा गया है और जैसा मुनिधर्म कहा गया है, उन दोनों में सामान्य रीति से प्राणियों का संरक्षण मूल है ॥७४६॥ इसी प्रकार विस्तार से क्रियारूप जितना भी व्रतों का समुदाय कहा गया है वह केवल एक सर्व सावद्ययोग की निवृत्ति के लिये ही कहा गया है ॥७४७॥ अर्थात् जिनमत का यही उपदेश है और यही आदेश है कि सर्व सावद्ययोग की निवृत्ति को ही व्रत कहते हैं ॥७४८॥ यहाँ पर सर्व शब्द से उसका यौगिक अर्थ अन्तरंग और बहिरंग वृत्ति लिया गया है तथा सर्व सावद्य शब्द का अर्थ प्राणों का छेद करना है और वही हिंसा कही गई है । इस हिंसा में जो बुद्धि-पूर्वक उपयोग होता है वह योग है या जो अबुद्धि-पूर्वक सूक्ष्म उपयोग होता है वह भी योग है ॥७४९-७५०॥ तथा इस सर्व सावद्ययोग का अभाव होना ही उससे निवृत्ति है और वही वास्तव में व्रत माना गया है । यदि सर्व सावद्ययोग की निवृत्ति अंशरूप से होती है, तो व्रत भी एकदेश होता है और यदि वह सब प्रकार से होती है तो व्रत भी सर्व-देश होता है ॥७५१॥