


सर्वतः सिद्धमेवैतद्व्रतं बाह्यं दयाङ्गिषु ।
व्रतमन्तः कषायाणां त्यागः सैवात्मनि कृपा ॥752॥
लोकासंख्यातमात्रास्ते यावद्रागादयः स्फुटम् ।
हिंसा स्यात् संविदादीनां धर्माणां हिंसनाच्चित: ॥753॥
अर्थाद्रागादयो हिंसा चास्त्यधर्मो व्रतच्युति: ।
अहिंसा तत्परित्यागो व्रतं धर्मोऽथवा किल ॥754॥
आत्मेतराङ्गिणामङ्गरक्षणं यन्मतं स्मृतौ ।
तत्परं स्वात्मरक्षाया: कृते नातः परत्र तत् ॥755॥
सत्सु रागादिभावेषु बन्धः स्यात्कर्मणां बलात् ।
तत्पाकादात्मनो दुःखं तत्सिद्ध: स्वात्मनो वध: ॥756॥
तत: शुद्धोपयोगो यो मोहकर्मोदयादृते ।
चारित्रापरनामैतद् व्रतं निश्चयतः परम् ॥757॥
चारित्रं निर्जरा हेतुर्न्यायादप्यस्त्यबाधितम् ।
सर्वस्वार्थक्रियामर्हत् सार्थनामास्ति दीपवत् ॥758॥
रूढे: शुभोपयोगोऽपि ख्यातश्चारित्रसंज्ञया ।
स्वार्थक्रियामकुर्वाणः सार्थनामा न निश्चयात् ॥759॥
किन्तु बन्धस्य हेतुः स्यादर्थात्तत्प्रत्यनीकवत् ।
नासौ वरं वरं यः स नापकारोपकारकृत् ॥760॥
विरुद्धकार्यकारित्वं नास्यासिद्धं विचारसात् ।
बन्धस्यैकान्ततो हेतोः शुद्धादन्यत्र सम्भवात् ॥761॥
नोह्यम् प्रज्ञापराधत्वान्निर्जरा हेतुरञ्जसा ।
अस्ति नाबन्धहेतुर्वा शुभो नाप्यशुभावहः ॥762॥
अन्वयार्थ : इसप्रकार यह बात सब प्रकार से सिद्ध हो गई कि प्राणियों पर दया करना बाह्य व्रत है और कषायों का त्याग करना अन्तरंग व्रत है । अपनी आत्मा पर कृपा भी यही है ॥७५२॥ क्योंकि जब तक असंख्यात लोकप्रमाण वे रागादिक भाव रहते हैं, तब तक ज्ञानदिक धर्मों की हिंसा होने से आत्मा की हिंसा होती रहती है ॥७५३॥ आशय यह है कि वास्तव में रागादि भाव ही हिंसा है, अधर्म है, व्रत से च्युत होना है और रागादिक का त्याग करना ही अहिंसा है, व्रत है अथवा धर्म है ॥७५४॥ आगम में जो अपने और दूसरे प्राणियों के शरीर की रक्षा का निर्देश किया गया है वह भी केवल आत्मरक्षा के लिये ही किया गया है पर के लिये नहीं ॥७५५॥ रागादि भावों के होने पर कर्मों का बन्ध नियम से होता है और उस बंधे हुए कर्म के उदय से आत्मा को दुख होता है, इसलिये 'रागादि भावों का होना आत्मवध है' यह बात सिद्ध होती है ॥७५६॥ इसलिये मोहनीय कर्म के उदय के आभाव में जो शुद्धोपयोग होता है उसका दूसरा नाम चारित्र है और वही निश्चय से उत्कृष्ट व्रत है ॥७५७॥ 'चारित्र सब प्रकार से अपनी अर्थक्रिया को करता हुआ भी निर्जरा का कारण है' यह बात न्याय से भी अबाधित है इसलिये वह दीपक के समान सार्थक नामवाला है ॥७५८॥ यद्यपि रूढि से शुभोपयोग भी चारित्र इस नाम से प्रसिद्ध है परन्तु वह अपनी अर्थक्रिया को करने में असमर्थ है इसलिये वह निश्चय से सार्थक नाम वाला नहीं है ॥७५९॥ किन्तु वह अशुभोपयोग के समान वास्तव में बन्ध का कारण है इसलिये यह श्रेष्ठ नहीं है । श्रेष्ठ वह है जो न तो उपकार ही करता है और न अपकार ही करता है ॥७६०॥ 'अशुभपयोग विरुद्ध कार्यकारी है' यह बात विचार करने पर असिद्ध भी नहीं प्रतीत होती, क्योंकि शुभोपयोग एकान्त से बन्ध का कारण होने से वह शुद्धोपयोग के अभाव में ही पाया जाता है ॥७६१॥ बुद्धिदोष से ऐसी तर्कणा भी नहीं करनी चाहिये कि 'शुभोपयोग एकदेश निर्जरा का कारण है', क्योंकि न तो शुभोपयोग ही बन्ध के अभाव का कारण है और न अशुभोपयोग ही बन्ध के अभाव का कारण है ॥७६२॥