कर्मादानक्रियारोध: स्वरूपाचरणं च यत्‌ ।
धर्म: शुद्धोपयोगः स्यात्‌ सैष चारित्रसंज्ञक: ॥763॥
(उक्तञ्च)
चारितं खलु धम्मो धम्मो जो सो समो त्ति णिद्दिट्ठो ।
मोहक्खोहविहीणो परिणामो अप्पणो धम्मो ॥
अन्वयार्थ : कर्मों के ग्रहण करने की क्रिया का रुक जाना ही स्वरूपाचरण है । वही धर्म है, वही शुद्धोपयोग है और वही चारित्र है ॥७६३॥
कहा भी है --
'निश्चय से चारित्र ही धर्म है और जो धर्म समभाव को कहते हैं । मोह और क्षोभ से रहित आत्मा का परिणाम ही धर्म है ॥'