
ननु सद्दर्शनज्ञानचारित्रैमेक्षिपद्धतिः ।
समस्तैरेव ने व्यस्तैस्तत्किं चारित्रमात्रया ॥764॥
अन्वयार्थ : जबकि सम्यग्दर्शन, सम्यक्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनों के मिलने पर ही मोक्ष-मार्ग होता है एक-एक के रहने पर नहीं, तब फिर केवल चारित्र को मोक्षमार्ग कहने से क्या प्रयोजन है ?