
सत्यं सद्दर्शनं ज्ञानं चारित्रान्तर्गतं मिथः ।
त्रयाणामविनाभावादिदं त्रयमखण्डितम् ॥764॥
किञ्च सद्दर्शनं हेतुः संविच्चारित्रयोर्द्वयोः ।
सम्यग्विशेषणस्योच्चैर्यद्वा प्रत्यग्रजन्मनः ॥766॥
अर्थोऽयं सति सम्यक्त्वे ज्ञानं चारित्रमत्र यत् ।
भूतपूर्वं भवेत् सम्यक् सूते वाभूतपूर्वकम् ॥767॥
शुद्धोपलब्धिशक्तिर्या लब्धिर्ज्ञानातिशायिनी ।
सा भवेत्सति सम्यक्त्वे शुद्धो भावोऽथवापि च ॥768॥
यत्पुनर्द्रव्यचारित्रं श्रुतज्ञानं विनापि दृक् ।
न तज्ज्ञानं न चारित्रमस्ति चेत्कर्मबन्धकृत् ॥769॥
तेषामन्यतमोद्देशो नास्ति दोषाय जातुचित् ।
मोक्षमार्गैकसाध्यस्य साधकानां स्मृतेरपि ॥770॥
बन्धो मोक्षश्च ज्ञातव्यः समासात्प्रश्नकोविदै: ।
रागांशैर्बन्ध एव स्थान्नारागांशै: कदाचन ॥771॥
येनांशेन सुदृष्टिस्तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति ।
येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य बन्धनं भवति ।
उक्तो धर्म स्वरूपोऽपि प्रसङ्गात्संगतोंऽशतः ।
कविर्लब्धावकाशस्तं विस्तराद्वा करिष्यति ॥772॥
अन्वयार्थ : यह कहना ठीक है तथापि सम्यग्दर्शन, सम्यक्ज्ञान ये दोनों मिलकर चारित्र में गर्भित हैं, क्योंकि तीनों का परस्पर अविनाभाव सम्बन्ध होने से ये तीनों अखण्डित हैं ॥७६४-७६५॥ दूसरी बात यह है कि सम्यग्दर्शन, यह ज्ञान और चारित्र इन दोनों में सम्यक् विशेषण का हेतु है । अथवा जो ज्ञान और चारित्र नूतन होते हैं उनमें सम्यक् विशेषण का एकमात्र यही हेतु ॥७६६॥ इसका यह अभिप्राय है कि पहले का जो ज्ञान और चारित्र होता है वह सम्यग्दर्शन के होने पर समीचीन हो जाता है । अथवा सम्यग्दर्शन यह अभूतपूर्व ज्ञान और चारित्र को जन्म देता है ॥७६७॥ शुद्ध आत्मा के जानने की शक्ति जो कि ज्ञान में अतिशय लाने वाली लब्धिरूप है वह सम्यक्त्व के होने पर ही होती है । अथवा शुद्ध भाव भी सम्यक्त्व के होने पर ही होता हे ॥७६८॥ और जो द्रव्य चारित्र और श्रुतज्ञान है वह यदि सम्यर्दशन के बिना होता है तो वह न ज्ञान है और न चारित्र है । यदि है तो केवल कर्म बंध करने वाला है ॥७६९॥ इसलिये इन तीनों में से किसी एक का कथन करना कभी भी दोषदायक नहीं है , क्योंकि मोक्षमार्ग एक साध्य है और ये तीनों उसके साधक माने गये हैं ॥७७०॥
प्रश्न के अभिप्राय को जाननेयाले पुरुषों को संक्षेप में बन्ध और मोक्ष का स्वरूप इस प्रकार जानना चाहिये कि रागांशरूप परिणामों से बन्ध होता है और रागांशरूप परिणामों के नहीं रहने से कभी भी बन्ध नहीं होता ॥७७१॥ कहा भी है -- "जिस अंश से यह सम्यग्दृष्टि है उस अंश से इसके बन्ध नहीं होता है । किन्तु जिस अंश से राग है उस अंश से इसके बन्ध अवश्य होता है ॥" इस प्रकार प्रसंगवश संक्षेप से युक्तियुक्त धर्म का स्वरूप कहा । कवि यथावकाश उसका विस्तार से कथन आगे करेगा ॥७७२॥