देवे गुरौ तथा धर्मे द्रष्टिस्तत्त्वार्थदर्शिनी ।
ख्याताप्यमूढ़दृष्टि: स्यादन्यथा मूढ़दृष्टिता ॥773॥
सम्यक्त्वस्य गुणोऽप्येष नालं दोषाय लक्षित: ।
सम्यग्दृष्टिर्यतोऽवश्यं तथा स्यान्न तथेतर: ॥774॥
अन्वयार्थ : समस्त कथन का सार यह है कि देव, गुरु और धर्म में यथार्थता को देखनेवाली दृष्टि ही अमूढदृष्टि कही गई है और इससे विपरीत दृष्टि ही मूढदृष्टि है ॥७७३॥ यह भी सम्यक्त्व का गुण है । यह किसी प्रकार भी दोषकारक नहीं है , क्‍योंकि जो सम्यग्दृष्टि है, वह नियम से अमूढदृष्टि होता है और जो सम्यग्दृष्टि नहीं है वह अमूढदृष्टि कभी नहीं होता ॥७७४॥