+ उपबृहण गुण -
उपबृंहणनामास्ति गुणः सम्यग्दृगात्मनः ।
लक्षणादात्मशक्तीनामवश्यं बृंहणादिह ॥775॥
आत्मशुद्धेरदोर्बल्यकरणं चोपबृंहणम्‌ ।
अर्थाद्‌-दृग्ज्ञप्तिचारित्रभावात् संवलितं हि तत् ‌॥776॥
जानन्नप्येष निःशेषात्पौरुषं नात्मदर्शने ।
तथापि यत्नवान्नात्र पौरुषं प्रेरयन्निव ॥777॥
नायं शुद्धोपलब्धौ स्याल्लेशतोऽपि प्रमादवान्‌ ।
निष्प्रमादतयात्मानमाददानः समादरात्‌ ॥778॥
यद्वा शुद्धोपलब्ध्यर्थमभ्यस्येदपि तद्वहिः ।
सत्क्रियां कांचिदप्यर्थात्तत्तत्साध्योपयोगिनीम्‌ ॥779॥
रसेन्द्रं सेवमानोऽपि कोऽपि पथ्यं न वाचरेत्‌ ।
आत्मनोऽनुल्लाघतामुज्झन्नुल्लाघतामपि ॥780॥
यद्वा सिद्धं विनायासात्स्वतस्तत्रोपब्रंहणम् ।
उर्ध्वमूर्ध्वगुणश्रेण्यां निर्जराया: सुसंभवात् ॥781॥
अवश्यम्भाविनी चात्र निर्जरा कृत्स्नकर्मणाम्‌ ।
प्रतिसूक्ष्मक्षणं यावदसंख्येयगुणक्रमात् ॥782॥
न्‍यायादायातमेतद्वै यावतांशेन तत्क्षतिः ।
वृद्धि: शुद्धोपयोगस्य वृद्धेर्वृद्धि: पुन: पुनः ॥783॥
यथा यथा विशुद्धे: स्याद्‌ वृद्धिरन्तः प्रकाशिनी ।
तथा तथा हृषीकाणामुपेक्षा विषयेष्वपि ॥784॥
ततो भूम्नि क्रियाकाण्डे नात्मशक्तिं स लोपयेत् ।
किन्तु संवर्धयेन्नूनं प्रयत्नादपि दृष्टिमान् ॥785॥
उपब्रंहणनामापि गुणः सद्दर्शनस्य य: ।
गणितो गणनामध्ये गुणानां नागुणाय च ॥786॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दृष्टि जीव का उपबृहण नाम का भी एक गुण है । आत्मीक शक्तियों की नियम से वृद्धि करना यह इसका लक्षण है ॥७७५॥ आत्मा की शुद्धि में दुर्बलता न आने देना या उसकी पुष्टि करना उपबृहण है । अर्थात्‌ आत्मा को सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूप भाव से च्युत नहीं होने देना ही उपबृहण है ॥७७६॥ यह जीव जानता हुआ भी आत्मसाक्षात्कार के विषय में पूरी तरह से पुरुषार्थ नहीं कर पाता । तथापि पुरुषार्थ की प्रेरणा देता हुआ ही मानो इस विषय में प्रयत्नवान रहता है ॥७७७॥ यह शुद्धोपलब्धि में रंचमात्र भी प्रमादी नहीं होता है किन्तु प्रमाद रहित होकर आदर से आत्मीक कार्यों में लगा रहता है ॥७७८॥ अथवा शुद्धोपलब्धि के लिये यह उस आत्मीक कार्य में उपयोगी पड़ने वाली किन्ही बाहरी सत्क्रियाओं का भी अभ्यास करता है ॥७७९॥ जैसे पारद भस्म को सेवन करता हुआ भी कोई पुरुष पथ्य करता है और कोई पुरुष पथ्य नहीं भी करता है । जो पथ्य करता है वह अपने रोग से मुक्ति पा लेता है और जो पथ्य नहीं करता है वह अपनी नीरोगता को भी खो बैठता है । वैसे ही प्रकृत में जानना चाहिये ॥७८०॥ अथवा सम्यगदृष्टि के बिना ही प्रयत्न के स्वभाव से उपबृहण गुण होता है, क्योंकि इसके ऊपर गुण श्रेणी निर्जरा पाई जाती है ॥७८१॥ इसके समस्त कर्मों की प्रति-समय असंख्यातगुण क्रम से निर्जरा अवश्य होती रहती है ॥७८२॥ इसलिए यह बात युक्ति से प्राप्त हुई कि इसके जितने रूप में कर्मों का क्षय होता है उतनी शुद्धोपयोग की वृद्धि होती है । इस प्रकार वृद्धि के बाद वृद्धि बराबर होती जाती है ॥७८३॥ इसके जैसे-जैसे विशुद्धि की भीतर प्रकाश देनेवाली वृद्धि होती है वैसे-वैसे इन्द्रियों के विषय में भी इसके उपेक्षा होती जाती है ॥७८४॥ इसलिये बड़े भारी क्रियाकाण्ड में वह सम्यग्दृष्टि अंपनी शक्ति को न छिपावे । किन्तु प्रयत्न से भी अपनी शक्ति को बढ़ावे ॥७८५॥ इस प्रकार सम्यग्दर्शन का जो उपबृंहण नाम का गुण है वह भी गुणों की गणना में आ जाता है । वह दोषाधायक नहीं है ॥७८६॥