
सुस्थितीकरणं नाम गुणः सम्यग्दृगात्मनः ।
घर्माच्च्युतस्य धर्मे तत् नाधर्मेऽधर्मण: क्षतेः ॥787॥
न प्रमाणीकृतं बृद्धै धर्मायाधर्मसेवनम्।
भाविधर्माशया केचिन्मन्दाः सावद्यवादिन: ॥788॥
परम्परेति पक्षस्य नावकाशोऽत्र लेशतः ।
मूर्खादन्यत्र नो मोहाच्छीतार्थ वन्हिमाविशेत् ॥789॥
नैतद्धर्मस्य प्राग्रूपं प्रागधर्मस्य सेवनम् ।
व्याप्तेरपक्ष धर्मत्वाद्धेतोर्वा व्यभिचारतः ॥790॥
प्रतिसूक्ष्मक्षणं यावदद्धेतोः कर्मोदयात्सवतः ।
धर्मो वा स्यादधर्मो वाऽप्येष सर्वत्र निश्चय: ॥791॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दृष्टि का एक स्थितीकरण नाम का गुण है । जो धर्म से च्युत हो गया है उसका धर्म में स्थित करना स्थितीकरण है। किन्तु अधर्म से च्युत हुए जीव को अधर्म में स्थित करना स्थितीकरण नहीं है ॥७८७॥ कितने ही अल्प-ज्ञानी भावी-धर्म की आशा से सावद्य का उपदेश देते है किन्तु ज्ञानी पुरुषों ने घर्म के लिए अधर्म का सेवन करना प्रमाण नहीं माना है ॥७८८॥ अधर्म के सेवन करने से परम्परा धर्म होता है ? इस पक्ष को यहां थोड़ा भी अवकाश नहीं है, क्योंकि मूर्ख को छोड़कर, कोई भी प्राणी मोहवश शीत के लिये अग्नि में प्रवेश नहीं करता है ॥७८९॥ पहले अधर्म का सेवन करना यह धर्म का पूर्व रूप नही हो सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर व्याप्ति पक्षधम से रहित हो जाती है और हेतु व्यभिचारी हो जाता है ॥७९०॥ प्रतिसमय जबतक कर्मों का उदयरूप हेतु मौजूद है तबतक स्वतः धर्म भी हो सकता है और अधर्म भी हो सकता है यह सर्वत्र नियम है ॥७९१॥