
तत्स्थितीकरणं द्वेधाऽध्यक्षात्स्वापरभेदतः ।
स्वात्मनः स्वात्मतत्त्वेऽर्थात्परत्वे तु परस्य तत् ॥792॥
अन्वयार्थ : यह प्रत्यक्ष से प्रतीत होता है कि वह स्थितीकरण स्व और पर के भेद से दो प्रकार का है । अपनी आत्मा को अपने आत्म-तत्त्व में स्थित करना यह स्थितीकरण है और अन्य की आत्मा को उसके आत्म-तत्त्व में स्थित करना यह परस्थितीकरण है ॥७९२॥