+ स्वस्थितिकरण का स्वरुप निर्देश -
तत्र मोहोदयोद्रेकाच्च्युतस्यात्मस्थितेश्चितः ।
भूयः संस्थापनं स्वस्य स्थितीकरणमात्मनि ॥793॥
अयं भाव: क्वचिद्वैवाद्ददर्शनात्स पतत्यघः ।
व्रज त्यूर्ध्व पुनर्देवात्सम्यगारुह्य दर्शनम्‌ ॥794॥
अथ क्वचिद्यथाहेतु दर्शनादपतन्नपि ।
भावशुद्धिमधोऽघोंशैरूउर्ध्वमुर्ध्वं प्ररोहति ॥795॥
क्वचिद्बहिः शुभाचारं- स्वीकृतं चापि मुञ्चति ।
न मुञ्चति कदाचिद्वै मुक्त्वा वा पुनराश्रयेत् ॥796॥
यद्वा बहिःक्रियाचारे यथावस्थं स्थितेऽपि च ।
कदाचिद्दीप्यमानोऽन्तर्भावैर्भूत्वा च वर्तते ॥797॥
नासंभवमिदं यस्माच्चारित्रावरणोदयः ।
अस्ति तरतमस्वांशैर्गच्छन्निम्नोन्नतामिह ॥798॥
अत्राभिप्रेतमेवैतत्स्वस्थितीकरणं स्वत: ।
न्‍यायात्कुतश्चिदत्रास्ति हेतुस्तत्रानवस्थितिः ॥799॥
अन्वयार्थ : मोह के उदय की तीव्रता-वश आत्म-स्थिति से डिगे हुए आत्मा को फिर से अपनी आत्मा में स्थित करना स्वस्थितीकरण है ॥७९३॥ आशय यह है कि कभी दैववश वह जीव सम्यग्दर्शन से नीचे गिर जाता है । और कभी दैववश सम्यक दर्शन को पाकर ऊपर चढ़ता है ॥७९४॥ अथवा कभी अनुकूल कारण सामग्री के मिलने पर सम्यग्दर्शन से नहीं गिरता हुआ भी भावों की शुद्धि को नीचे-नीचे के अंशो से ऊपर-ऊपर को बढ़ाता है ॥७९५॥ कभी यह जीव बाह्य शुभाचार को स्वीकार करके भी छोड़ देता है और कदाचित्‌ नहीं भी छोड़ता है । या कदाचित्‌ छोड़ कर पुनः प्रहण कर लेता है ॥७९६॥ अथवा बाह्य क्रियाचार से अवस्थानुसार स्थित रहता हुआ भी कदाचित्‌ अन्तरंग भावों से देदीप्यमान होता हुआ स्थित रहता है ॥७९७॥ और यह बात असम्भव भी नहीं है, क्योंकि इसके अपने तरतमरूप अंशों के कारण हीनाधिक अवस्था को प्राप्त होने वाला चारित्र-मोहनीय का उदय पाया जाता है ॥९९८॥ यहां इतना ही अभिप्राय है कि स्वस्थितीकरण होता है । इसमें कोई अन्य कारण नहीं है । यदि किसी नीति-वश इसमें किसी अन्य कारण की कल्पना की जाती है तो अनवस्था दोष आता है ॥७९९॥