सुरिथतीकरणं नाम परेषां सदनुग्रहात् ।
भ्रष्टानां स्वपदात्तत्र स्थापनं तत्पदे पुन: ॥800॥
धर्मादेशोपदेशाभ्यां कर्तव्योऽनुग्रहः परे ।
नात्मव्रतं विहायास्तु तत्परः पररक्षणे ॥801॥
(उक्तञ्च)
आदहिदं कादव्वं जइ सक्कइ परहिदं व कादव्वं ।
आदहिदपरहिदादो आदहिदं सुट्ठु कादव्वं ॥
उक्तं दिङ्मात्रतोऽप्यत्र सुस्थितीकरणं गुणः ।
निर्जरायां गुणश्रेणौ प्रसिद्ध: सुदृगात्मनः ॥802॥
अन्वयार्थ : अपने पद से भ्रष्ट हुए अन्य जीवों को सदनुग्रहभाव से उसी पद में फिर से स्थापित कर देना यह परस्थितीकरण है ॥८००॥ धर्म के आदेश और उपदेश द्वारा ही दूसरे का अनुग्रह करना चाहिये । किन्तु अपने व्रत को छोड़कर दूसरे जीवों की रक्षा करने में तत्पर होना उचित नहीं है ॥८०१॥
कहा भी है --.
'सर्व प्रथम आत्महित करना चाहिये । यदि शक्य हो तो परहित भी करना चाहिये। किन्तु आत्महित और परहित इन दोनों में से आत्महित भले प्रकार करना चाहिये । इस प्रकार संक्षेप से यहाँ पर स्थितीकरण गुण कहा जो कि सम्यग्टृष्टि जीव के गुणश्रेणी निर्जरा में भलीप्रकार प्रसिद्ध है ॥