
वात्सल्यं नाम दासत्वं सिद्धर्हम्बिम्बवेश्मसु ।
संघे चर्तुविधे शास्त्रे स्वामिकार्ये सुभृत्यवत् ॥803॥
अर्थादन्यतमस्योच्चैरुद्दिष्टेषु स दृष्टिमान् ।
सत्सु घोरोपसर्गेषु तत्परः स्यात्तदत्यये ॥804॥
यद्वा न ह्यात्मसामर्थ्यं यावन्मन्त्रासिकोशकम् ।
तावद् दृष्टुं च श्रोतुं च तद्वाधां सहते न सः ॥804॥
तद-द्विधाऽथ च वात्सल्यं भेदात्स्पपरगोचरात् ।
प्रधानं स्वात्मसम्बन्धि गुणो यावत्परात्मनि ॥8409॥
परीषहोपसर्गाद्यै: पीडितस्यापि कुत्रचित् ।
न शैथिल्यं शुभाचारे ज्ञाने ध्याने तदादिमम् ॥807॥
इतरत्प्रागिह ख्यातं गुणो दृश्टिमतः स्फुटम् ।
शुद्धज्ञानबलादेव यतो वाघापकर्षणम् ॥808॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार उत्तम सेवक स्वामी के कार्य में दासभाव रखता है उसी प्रकार सिद्ध प्रतिमा, जिनबिम्ब, जिनमन्दिर, चार प्रकार का संघ और शास्त्र इन सब में दासभाव रखना वात्सल्य अंग है ॥८०३॥ अभिप्राय यह है कि पूर्वोक्त सिद्ध प्रतिमा आदि में से किसी एक पर घोर-उपसर्ग आने पर वह सम्यग्दृष्टि जीव इसके दूर करने के लिये सदा तत्पर रहता है ॥८०४॥ अथवा यदि आत्मीक सामर्थ्य नहीं है तो जबतक मन्त्र, तलवार और धन है तब तक वह उन सिद्ध प्रतिमा आदि पर आई हुई बाधा को न तो देख ही सकता है और न सुन ही सकता है ॥८०५॥ स्व और पर के भेद से वह वात्सल्य दो प्रकार का है । इनमें से अपनी आत्मा से सम्बन्ध रखनेवाला वात्सल्य प्रधान है और अन्य आत्मा से सम्बन्ध रखनेवाला वात्सल्य गौण है ॥८०६॥ परीषह और उपसर्ग आदि से कहीं पर पीड़ित होकर भी शुभाचार में, ज्ञान में और ध्यान में शिथिलता न लाना यह पहला स्व-वात्सल्य है ॥८०७॥ दूसरा पर-वात्सल्य इस ग्रन्थ में पहले कह आये हैं । वह भी सम्यग्दृष्टि का प्रकट गुण है क्योंकि शुद्ध ज्ञान के बल से ही बाधा दूर की जा सकती है ॥८०८॥