
प्रभावनाङ्गसंज्ञोऽस्ति गुणः सद्दर्शनस्य वै ।
उत्कर्ष करणं नाम लक्षणादपि लक्षितम् ॥809॥
अथातद्धर्मण: पक्षे नावद्यस्य मनागपि ।
धर्म पक्ष क्षतिर्यस्मादधर्मोत्कर्षपोषणात् ॥810॥
पूर्ववत्सोऽपि द्विविधः स्वान्यात्मभेदतः पुन: ।
तत्राद्यो वरमादेयः स्यादादेयः परोऽप्यतः ॥811॥
उत्कर्षो यद्वलाधिक्यादधिकीकरणं वृषे ।
असत्सु प्रत्यनीकेषु नालं दोषाय तत्क्वचित् ॥812॥
मोहारातिक्षते: शुद्ध: शुद्धाच्छुद्धतरस्ततः ।
जीव: शुद्धतमः कश्चीदस्तीत्यात्मप्रभावना ॥813॥
नेदं स्यात्पौरुषायत्तं किन्तु नूनं स्वभावतः ।
उर्ध्वमूर्ध्वगुणश्रेणौ यतः सिद्धिर्यथोत्तरम् ॥814॥
बाह्यः प्रभावनाङ्गोऽस्ति विद्यामन्त्रादिभिर्बलैः ।
तपोदानादिभिर्जैनधर्मोत्कर्षो विधीयताम् ॥815॥
परेषामपकर्षाय मिथ्यात्वोत्कर्षशालिनाम् ।
चमत्कारकरं किन्चित्तद्विधेयं महात्मभि: ॥816॥
उक्त: प्रभावनांङ्गोऽपि गुणः सद्दर्शनान्वितः ।
येन सम्पूर्णतां याति दर्शनस्य गुणाष्टकम् ॥817॥
इत्यादयो गुणाश्चान्ये विद्यन्ते सद्-दृगात्मनः ।
अलं चिन्तनया तेषामुच्यते यद्विवक्षितम् ॥818॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दर्शन का एक प्रभावना नामक गुण है । इसका लक्षण उत्कर्ष करना है । इसी से यह जाना जाता है ॥८०९॥ हिंसा अतद्धर्म है इसलिये इस पक्ष का थोड़ा भी पोषण नहीं करना चाहिए क्योंकि अधर्म के उत्कर्ष का पोषण करने से धर्म पक्ष की हानि होती है ॥८१०॥ पहले अंगों के समान यह अंग भी स्वात्मा और परात्मा के भेद से दो प्रकार का है । उनमें से पहला अच्छी तरह से उपादेय है और इसके बाद दूसरा भी उपादेय है ॥८११॥ यतः धर्म को हानि पहुँचाने वाले असमीचीन कारणों के रहने पर अधिक बल लगा कर धर्म की वृद्धि करना ही उत्कर्ष है अतः ऐसा उत्कर्ष किसी भी हालत में दोषकारक नहीं है ॥८१२॥ कोई जीव मोहरूपी शत्रु का नाश होने से शुद्ध हो जाता है । कोई शुद्ध से शुद्धतर हो जाता है और कोई शुद्धतम हो जाता है । इस प्रकार अपना उत्कर्ष करना स्वात्म-प्रभावना है ॥८१३॥ यह सब पौरुषाधीन नहीं है किन्तु स्वभाव से ही ऐसा होता है क्योंकि ऊपर-ऊपर जैसे गुण-श्रेणी निर्जरा बढ़ती जाती है तदनुसार आगे-आगे उसकी सिद्धि होती है ॥८१४॥ विद्या और मन्त्र आदि बल के द्वारा तथा तप और दान आदि के द्वारा जैन-धर्म का उत्कर्ष करना बाह्य-प्रभावना अंग है ॥८१५॥ जो अन्य लोग मिथ्यात्व का उत्कर्ष चाहते हैं उनका अपकर्ष करने के लिए महापुरुषों को कुछ ऐसे कार्य करने चाहिये जो चमत्कार पैदा करनेवाले हों ॥८१६॥ इस प्रकार सम्यग्दर्शन का प्रभावना नाम का गुण कहा । जिसके कारण सम्यग्दर्शन के आठों गुण पूर्णता को प्राप्त होते हैं ॥८१७॥ इन आठ गुणों के सिवा सम्यग्दृष्टि के और भी बहुत से गुण हैं । किन्तु उनका विचार करना छोड़ कर प्रकृत में जो विवक्षित है उसका कथन करते हैं ॥८१८॥