
प्रकृतं तद्यथास्ति स्वं स्वरूपं चेतनात्मनः ।
सा त्रिधात्राप्युपादेया सद्-दृष्टेर्ज्ञानचेतना ॥819॥
श्रद्धानादिगुणाश्चैते बाह्योल्लेखच्छलादिह ।
अर्थात्सद्दर्शनस्यैकं लक्षणं ज्ञानचेतना ॥820॥
अन्वयार्थ : प्रकृत बात यह है कि आत्मा का निज स्वरूप चेतना है और वह तीन प्रकार की है -- कर्मचेतना, कर्मफल चेतना और ज्ञान चेतना । उनमें से सम्यग्दृष्टि को ज्ञान चेतना उपादेय है ॥८१९॥ इस ग्रन्थ में सम्यग्दर्शन के जो श्रद्धान आदि गुण बतलाये हैं, सो वे बाह्य-कथन के छल से ही बतलाये हैं । वास्तव में उसका ज्ञान-चेतना यही एक लक्षण है ॥८२०॥