+ सम्यग्दर्शन के निश्चय / व्यवहार या सराग / वीतराग भेद पर स्पष्टीकरण -
ननु रूढिरिहाप्यस्ति योगाद्वा लोकतोऽथवा ।
तत्सम्यक्त्वं द्विघाप्यर्थनिश्चयाद्‌ व्यवहारतः ॥821॥
व्यवहारिकसम्यक्त्वं सरागं सविकल्पकम ।
निश्चयं वीतरागं तु सम्यक्त्वं निर्विकल्पकम्‌ ॥822॥
इत्यस्ति वासनोन्मेष: केषाश्चिन्मोहवशालिनाम् ।
तन्मते वीतरागस्य सद्-दृष्टेर्ज्ञानचेतना॥823॥
तै: सम्यक्त्वं द्विधा कृत्वा स्वामिभेदो द्विधा कृतः ।
एकः कश्चित्सरागोऽस्ति वीतरागश्च कश्चन ॥824॥
तत्रास्ति वीतरागस्य कस्यचिज्ज्ञानचेतना ।
सद्-दृष्टेर्निविकल्पस्य नेतरस्य कदाचन ॥825॥
व्यावहारिकसद्दृष्टे: सविकल्पस्य रागिणः ।
प्रतीतिमात्रमेवास्ति कुतः स्याज्ज्ञानचेतना ॥826॥
इति प्रज्ञापराधेन ये वदन्ति दुराशयाः ।
तेषां यावच्छ्रुताभ्यासः कायक्लेशाय केवलम्‌ ॥827॥
अत्रोच्यते समाधानं सामवादेन सूरिभिः ।
उच्चैरुत्फणिते दुग्घे योज्यं जलमनाविलम्‌ ॥828॥
सतृणाभ्यवहारित्वं करीव कुरुते कुदृक् ।
तज्जहीहि जहीहि त्वं कुरु प्राज्ञ विवेकताम् ॥829॥
वन्हेरौष्ण्यमिवात्मज्ञ पृथक्कर्त्तुं त्वमर्हसि ।
मा विभ्रमस्व दृष्ट्वापि चक्षुषाऽचाक्षुषाशयाः ॥830॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दर्शन के विषय में ऐसी यौगिक व लौकिक रूढ़ि है कि वह सम्यग्दर्शन निश्चय और व्यवहार के भेद से दो प्रकार का है ॥८२१॥ उनमें से जो सराग और सविकल्प है वह व्यवहार सम्यक्त्व है । तथा जो वीतराग और निर्विकल्प है वह निश्चय सम्यक्त्व है ॥८२२॥ इसप्रकार किन्ही मोही जीवों के वासनाजन्‍य संस्कार बना हुआ है । उनके मत में वीतराग सम्यग्दृष्टि के तो ज्ञानचेतना होती है ॥८२३॥ उन्होंने सम्यक्त्व के दो भेद करके तदनुसार स्वामी के भी दो भेद कर लिए हैं । एक सराग सम्यग्दृष्टि और दूसरा वीतराग सम्यग्दृष्टि ॥८२४॥ उनमें से जो निर्विकल्प वीतराग सम्यग्दृष्टि है, उसी के ज्ञान चेतना होती है । दूसरे सराग सम्यग्दृष्टि के यह ज्ञान चेतना कभी नहीं होती ॥८२५॥ सविकल्प और सरागी व्यवहार सम्यग्दृष्टि के प्रतीतिमात्र ही होती है । उसके ज्ञानचेतना कैसे हो सकती है ॥८२६॥ बुद्धि के दोष से खोटे आशयवाले जो जीव ऐसा कहते हैं उनका जितना भी श्रुत का अभ्यास है वह केवल काय-क्लेश के लिए ही है ॥८२७॥ अब यहाँ पर आचार्य शान्तिकारक वचनों के द्वारा इसका समाधान करते हैं, क्योंकि दूध में उफान के आने पर उसमें निर्मल जल डालना ही ठीक है ॥८२८॥ मिथ्यादृष्टि जीव हाथी के समान मय घास फूस के सब कुछ खा जाता है, इसीलिए हे प्राज्ञ ! तू ऐसे अज्ञान को छोड़-छोड़ और विवेक से काम ले ॥८२९॥ जिस प्रहार मिले हुए अनेक पदार्थों में से अग्नि की उष्णता अलग की जा सकती है उसी प्रकार भो आत्मज्ञ ! तू अन्य पदार्थों से अपनी आत्मा को पृथक्‌ कर सकता है, इसलिये आंख से देखकर भी अन्धा बनकर भ्रम में मत पड़ ॥८३०॥