
विकल्पो योगसंक्रातिरर्थाज्ज्ञानस्य पर्ययः ।
ज्ञेयाकारः स ज्ञेयार्थाद् ज्ञेयार्थान्तरसङ्गत: ॥831॥
क्षायोपशमिकं तत्स्यादर्थादक्षार्थसम्भवात् ।
क्षायिकात्यक्षज्ञानस्य संक्रान्तेरप्यसम्भवात् ॥832॥
अस्ति क्षायिकज्ञानस्य विकल्पत्वं स्वलक्षणात् ।
नार्थादर्थान्तराकारयोगसंक्रान्तिलक्षणात् ॥833॥
तल्लक्षणं स्वापूर्वार्थ विशेषग्रहणात्मकम् ।
एकोऽर्थो ग्रहणं तत्स्यादाकारः सविकल्पता ॥834॥
विकल्प: सोऽधिकारेऽस्मिन्नाधिकारी मनागपि ।
योगसंक्रान्तिरूपो यो विकल्पोऽघिकृतोऽधुना ॥835॥
ऐन्द्रियं तु पुनर्ज्ञानं न संक्रान्तिमृते क्वचित् ।
यतोप्यस्य क्षणं यावदर्थादर्थान्तरे गति: ॥836॥
इदं तु क्रमवर्त्यस्ति न स्यादक्रमवर्ति यत् ।
एकां व्यक्तिं परित्यज्य पुनर्व्यक्तिं समाश्रयेत् ॥837॥
इयं त्वावश्यकी वृत्ति: समव्याप्तेरिवाद्व या ।
इयं तत्रैव नान्यत्र तत्रैवेयं न चेतरा ॥838॥
अन्वयार्थ : वास्तव में विकल्प योग संक्रान्ति का नाम है अर्थात् एक ज्ञेय से हट कर दूसरे ज्ञेय से सम्बन्ध रखनेवाली तदाकार जो ज्ञान की पर्याय होती है उसे विकल्प कहते हैं ॥८३१॥ यह क्षायोपशमिक है । वास्तव में यह इन्द्रिय और पदार्थ के निमित्त से उत्पन्न होता है, क्योंकि जो क्षायिक अतीन्द्रिय ज्ञान है उसमें संक्रान्ति किसी भी हालत में सम्भव नहीं है ॥८३२॥ यद्यपि अपने लक्षण के अनुसार क्षायिक ज्ञान भी विकल्पात्मक है । परन्तु वह वास्तव में विकल्प के अर्थे से अर्थान्तराकार योग संक्रान्ति रूप लक्षण के अनुसार विकल्पात्मक नहीं है ॥८३३॥ क्षायिक ज्ञान में स्व और अपूर्व अर्थ को विशेषरूप से ग्रहण करना ही विकल्प का लक्षण है, क्योंकि उसका विषयभूत अर्थ एक है और उसके आकार का नाम ही सविकल्पता है ॥८३४॥ ऐसा विकल्प अर्थात ज्ञान का स्वलक्षणरूप विकल्प इस अधिकार में थोड़ा भी नहीं लिया गया है । किन्तु योग-संक्रान्तिरूप जो विकल्प है वही यहां पर लिया गया हे ॥८३५॥ इन्द्रियजन्य ज्ञान तो कहीं भी योग-संक्रान्ति के बिना नहीं होता है, क्योंकि इसकी प्रतिक्षण एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ में संक्रान्ति होती रहती है ॥८३६॥ और यह ज्ञान क्रमवर्ती होता है, अक्रमवर्ती नहीं होता क्योंकि यह एक पदार्थ को छोड़ कर ही दूसरे पदार्थ को विषय करता है ॥८३७॥ यह इस ज्ञान की आवश्यक वृत्ति है क्योंकि इन्द्रिय-ज्ञान की इस वृत्ति के साथ समव्याप्ति होने से यह कथंचित् अभिन्न के समान है । यह वृत्ति इसी ज्ञान में होती है अन्य ज्ञान में नहीं । इसे दूसरे शब्दों में यों कह सकते हैं कि इस ज्ञान में यही वृत्ति होती है, अन्य नहीं ॥८३८॥