यत्पुनर्ज्ञानमेकत्र नैरन्तर्येण कुत्रचित्‌ ।
अस्ति तद्-ध्यानमत्रापि क्रमो नाप्यक्रमोऽर्थतः ॥839॥
एकरूपभिवाभाति ज्ञानं ध्यानैकतानतः ।
तत्स्यात्पुन: पुनर्वृत्तिरूपं स्यात्क्रमवर्ति च ॥840॥
नात्र हेतुः परं साध्ये क्रमत्वेऽर्थान्तराकृतिः ।
किन्तु तत्रैव चैकार्थे पुनर्वृत्तिरपि क्रमात्‌ ॥841॥
नोहयं तत्राप्यतिव्याप्तिः क्षायिकात्यक्षसंविदि ।
स्पात्परिणामवत्त्वेऽपि पुनर्वृत्तेरसम्भवात्‌ ॥842॥
यावच्छद्मस्थजीवानामस्ति ज्ञानचतुष्टयम् ।
नियतक्रमवर्तित्वात्सर्वं संक्रमणात्मकम् ॥843॥
नालं दोषाय तच्छक्तिः सूक्तसंक्रान्तिलक्षणा ।
हेतोर्वैभाविकत्वेऽपि शक्तित्वाज्ज्ञानशक्तिवत्‌ ॥844॥
ज्ञानसञ्चेतनायास्तु न स्यात्तद्विघ्न कारणम् ।
तत्पर्यायस्तदेवेति तद्विकल्पो न तद्रिपु: ॥845॥
अन्वयार्थ : जो क्षायोपशमिक ज्ञान किसी एक विषय में निरन्तर रहता है वह यद्यपि ध्यान कहलाता है तथापि इसमें भी वास्तव में क्रम ही पाया जाता है अक्रम नहीं ॥८३९॥ वह ध्यानरूप एकाग्रता के कारण एकसा प्रतीत होता है पर है वास्तव में यह पुनः पुनः प्रवृत्ति रूप और क्रमवर्ती ॥८४०॥ इस क्षायोपशमिक ज्ञान में क्रमपने की सिद्धि करने में अर्थ से अर्थान्तराकार होना ही केवल हेतु नहीं है किन्तु उसी एक अर्थ में क्रम से पुनः पुनः प्रवृत्ति करना भी उसकी सिद्धि में हेतु है ॥८४१॥ ध्यानरूप ज्ञान का यह लक्षण क्षायिक अतीन्द्रिय ज्ञान में अतिव्याप्त हो जाता है ऐसा तर्क भी यहाँ नहीं करना चाहिये, क्योकि यद्यपि क्षायिक ज्ञान परिणामी है तथापि उसकी पुनः पुनः प्रवृत्ति सम्भव नहीं है ॥८४२॥ इसलिये यह सिद्ध हुआ कि छद्मस्थ जीवों के चारों ही ज्ञान नियम से क्रमवर्ती हैं और इसलिये वे संक्रमण रूप हैं ॥८४३॥ जिसका मुख्य लक्षण संक्रान्ति कहा है ऐसी यह क्षायोपशमिक ज्ञान-शक्ति किसी प्रकार भी दोष पैदा करने में समर्थ नहीं है । कारण कि यद्यपि यह वैभाविक है तथापि ज्ञान-शक्ति के समान यह भी एक शक्ति है ॥८४४॥ 'वह क्षायोपशमिक ज्ञान, ज्ञान-चेतना का तो बाधक होगा ही' यदि कोई ऐसा कहे सो यह कहना भी युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञान की पर्याय ज्ञानरूप ही होती है इसलिये उसका भेद ज्ञान-चेतना का शत्रु नहीं हो सकता ॥८४५॥