


नतु चेति प्रतिज्ञा स्यादर्थादर्थान्तरे गतिः ।
आत्मनोऽन्यत्र तत्रास्ति ज्ञानसंचेतनान्तरम्॥846॥।
सत्यं हेतोर्विपक्षत्वे वृत्तित्वाद् व्यभिचारता।
यतोऽत्रान्यात्मनोऽन्यत्र स्वात्मनि ज्ञानचेतना॥847॥
किन्च सर्वस्य सद्दृष्टेर्नित्यं स्याज्ज्ञानचेतना ।
अव्युच्छिन्नप्रवाहेण यद्वाऽखंडैकघारया॥848॥
हेतुस्तत्रास्ति सध्रीची सम्यक्त्वेनान्वयादिह ।
ज्ञानसंचेतनालब्धिर्नित्या स्वावरणव्ययात्॥849॥
कादाचित्काऽस्ति ज्ञानस्य चेतना स्वोपयोगिनी ।
नालं लब्धेर्विनाशाय समव्याप्तेरसम्भवात्॥840॥
अस्त्यत्र विषमव्याप्तिर्यावल्लब्ध्युपयोगयो: ।
लब्धिक्षतेरवश्यं स्यादुपयोगक्षतिर्यत:॥851॥
अभावात्तूपयोगस्य क्षतिर्लब्धेश्च वा न वा ।
यत्तदावरणस्यामा दृशा व्याप्तिर्न चामुना॥852॥
अवश्यं सति सम्यक्त्वे तल्लब्ध्यावरणक्षतिः ।
न तत्क्षतिरसत्यत्र सिद्धमेतज्जिनागमात्॥853॥
नूनं कर्म फले सद्यश्चेतना वाऽथ कर्मणि ।
स्यात् सर्वत : प्रमाणाद्वै प्रत्यक्षं बलवद्यतः॥854॥
सिद्धमेतावतोक्तेन लब्धिर्या प्रोक्तलक्षणा ।
निरुपयोगरूपत्वान्निर्विकल्पा स्वतोऽस्ति सा॥855॥
शुद्ध: स्वात्मोपयोगो यः स्वयं स्याज्ज्ञानचेतना ।
निर्विकल्प: स एवार्थादर्थासंक्रान्तसंगते: ॥856॥
अन्वयार्थ : यह कहना ठीक है कि हेतु के विपक्ष में रहने से व्यभिचार दोष आता है किन्तु यहाँ पर अन्यात्मा के सिवा केवल स्वात्मा में ही ज्ञानचेतना मानी गई है इसलिये व्यभिचार दोष नहीं आता। ज्ञानचेतना के विषय में ऐसा नियम है कि वह सब सम्यग्दृष्टि जीवों के धारा प्रवाह रूप से अथवा अखण्ड एक धारारूप से सदा पाई जाती है ॥८४६-८४८॥ इसका कारण यह है कि सम्यक्त्व के साथ ,अन्वय होने के कारण समीचीन ज्ञानचेतनालब्धि अपने आवरण कर्म के अभाव से वहाँ सदा पाई जाती है ॥८४९॥ यह ज्ञान चेतना उपयोग सहित कदाचित् ही होती है, परन्तु उपयोग और लब्धि की समव्याप्ति नहीं होने से यह लब्धिरूप ज्ञानचेतना का विनाश करने में समर्थ नहीं है ॥८५०॥ यहाँ पर लब्धि और उपयोग में विषम व्याप्ति है , क्योंकि लब्धि की क्षति होने से उपयोग की क्षति नियम से हो जाती है ॥८५१॥ किन्तु उपयोग का अभाव होने से लब्धि की क्षति होती भी है और नहीं भी होती है, क्योंकि लब्धि की ही सम्यग्दर्शन के साथ व्याप्ति है उपयोग की नहीं ॥८५२॥ इसलिये जिनागम से यह बात सिद्ध हुई कि सम्यक्त्व के होने पर स्वानुभूत्यावरण कर्म का क्षयोपशम अवश्य हो जाता है और सम्यक्त्व के अभाव में उसका क्षयोपशम नहीं होता ॥८५३॥ किन्तु तब कर्मफल चेतना या कर्मचेतना होती है यह बात प्रमाण से सर्वथा सिद्ध है, क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाण सब प्रमाणों में बलवान है ॥८५४॥ इतना कहने से यह सिद्ध होता है कि उक्त लक्षणवाली जो लब्धि है वह उपयोगरूप नहीं होने के कारण स्वतः निर्विकल्प है ॥८५५॥ और शुद्ध स्वात्मोपयोगरूप जो ज्ञान चेतना है वह भी वास्तव में अर्थ संक्रान्ति से रहित होने के कारण स्वयं निर्विकल्प है ॥८५६॥