


अस्ति प्रश्नावकाशस्य लेशमात्रोऽत्र केवलम् ।
यत्कश्चिद्ध हिरर्थे स्यादुपयोगोऽन्यत्रात्मन:॥857॥
अस्ति ज्ञानोपयोगस्य स्वभावमहिमोदयः।
आत्मपरोभयाकारभावकश्च प्रदीपवत्॥858॥
निर्विशेषाद्यथात्मानमिव ज्ञेयमवैति च ।
तथा मूर्तानमूर्तांश्च धर्मादीनवगच्छति॥859॥
स्वस्मिन्नेवोपयुक्तो वा नोपयुक्तः स एव हि ।
परस्मिन्नुपयुक्तो वा नोपयुक्त: स एव हि॥860॥
स्वस्मिन्नेवोपयुक्तोऽपि नोत्कर्षाय स वस्तुतः ।
उपयुक्त: परत्रापि नापकर्षाय तत्त्वतः ॥861॥
तस्मात्स्वस्थितयेऽन्यस्मादेकाकारचिकीर्षया ।
मा सीदसि महाप्राज्ञ सार्थमर्थमवैहि भोः॥862॥
चर्यया पर्यटन्नेव ज्ञानमर्थेषु लीलया ।
न दोषाय गुणायाथ नित्यं प्रत्यर्थमर्थसात॥863॥
दोषः सम्यग्दृशो हानिः सर्वतोंऽशांशतोऽथवा ।
संवराग्रेसरायाश्र निर्जरायाः क्षतिर्मनाक्॥864॥
व्यस्तेनाथ समस्तेन तद्द्वस्योपमूलनम् ।
हानिर्वा पुण्यबन्धस्य हेयस्याप्यपकर्षणम्॥865॥
उत्पत्ति: पापबन्धस्य स्यादुत्कर्षोऽथवास्य च ।
तद्द्वयस्याथवा किन्चिद्यावदुद्वेलनादिकम् ॥866॥
गुणः सम्यकत्वसम्भूतिरुत्कर्षों वा सतोंशकै: ।
निर्जराभिनवा यद्वा संवरोऽभिनवो मनाकू ॥867॥
उत्कर्षो वानयोरंशेर्द्धयोरन्यतरस्य वा ।
श्रयोबन्धोऽथवोत्कर्षों यद्वा स्यादपकर्षणम्॥868॥
गुणदोषद्वयोरेवं नोपयोगोऽस्ति कारणम् ।
हेतुर्नान्यतरस्यापि योगवाही च नाप्ययम्॥869॥
अन्वयार्थ : ज्ञानोपयोग की महिमा -
शंका- अब यहाँ पर केवल इतने ही प्रश्न को अवकाश मिलता है कि सम्यग्दृष्टि जीव के आत्मा के सिवा अन्य पदार्थ में भी क्या उपयोग होता है ?
समाधान- ज्ञानोपयोग के स्वभाव की ऐसी महिमा है कि वह दीपक के समान स्व का, पर का और दोनों का प्रकाशक है॥८५७-८५८॥ वह एक को जाने और दूसरे को न जाने ऐसा भेद किये बिना जिस प्रकार अपने स्वरुप को और ज्ञेय इन दोनों को जानता है. उसी प्रकार वह अमूर्त और मूर्त धर्मादिक पदार्थों को भी जानता है॥८५९॥ वह अपने स्वरूप में ही उपयुक्त होता है अथवा अपने स्वरूप में उपयुक्त नहीं भी होता है। इसी प्रकार वह कभी पर पदार्थ में ही उपयुक्त होता है अथवा पर पदार्थ में उपयुक्त नहीं भी होता है॥८६०॥ जब वह अपने स्वरूप में ही उपयुक्त रहता है तब वह वास्तव में उत्कर्ष का कारण नहीं है और जब वह पर पदार्थ में उपयुक्त रहता है तब वह वास्तव में अपकर्ष का कारण नहीं है ॥८६१॥
इसलिये अपने स्वरूप में स्थित रहने के लिये अन्य पदार्थ से हटकर एकत्व जोड़ने की इच्छा से किसी अनर्थ में मत फस और भो महाग्राज्ञ ! प्रयोजनभूत अर्थ को जानने का ही प्रयत्न कर॥८६२॥ प्रवृत्ति के अनुसार ही ज्ञान सब पदार्थों को विषय करता है लीला से नहीं। इसलिये प्रयोजनवश सदा ही उसका प्रत्येक पदार्थ को विषय करना न तो दोषकारक ही है और न गुणकारक ही॥८६३॥
सर्वांशरूप से सम्यग्दर्शन की हानि होना, अथवा अंश रूप से उसकी हानि होना, संवर की अपेक्षा प्रधानभूत निर्जरा की कुछ हानि होना, अलग अलग इन दोनों की हानि होना, या मिलकर इन दोनों की हानि होना, सम्यग्दृष्टि की अपेक्षा हेयरूप पुण्यबन्ध की हानि होना, या उसका घट जाना, पापबन्ध की उत्पत्ति होना या उसका बढ़ जाना या इन दोनों की कुछ उद्वेलना आदि होना ये सब दोष हैं।॥८६४-८६६॥
सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति, या उसका आंशिक उत्कर्ष, या कुछ नवीन निर्जरा का होना, या कुछ नवीन संवर का होना , या इन दोनों का या इनमें से किसी एक का अंशरूप से उत्कर्ष होना, पुण्यबन्ध होना या उसका उत्कर्ष होना या उसका अपकर्ष नहीं होना ये सब गुण हैं ||८६७-८६८॥ इस प्रकार जितने भी गुण दोष बतलाये हैं उनका कारण उपयोग नहीं है और इनमें से किसी एक का भी कारण उपयोग नहीं है। तथा यह योगवाही भी नहीं है ॥८६९॥
विशेषार्थ - ज्ञान का यह स्वभाव है कि वह जैसे स्व को जानता है वैसे ही पर को भी जानता है, पर इससे उसकी न तो हानि ही होती है और न लाभ ही होता है। हानि लाभ के कारण अन्य हैं, ज्ञानोपयोग नहीं इतना मात्र निश्चित है। सम्यग्ज्ञान योगवाही नहीं है इसका यह भाव है कि वह सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति और अनुत्पत्ति इनमें से किसी का भी हेतु नहीं है। सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति के कारण अन्य हैं और अनुत्पत्ति के कारण अन्य हैं। उनका कारण ज्ञानोपयोग नहीं यह बात स्पष्ट है ॥८५८-८६९॥