सम्यक्त्वं जीवभावः स्यादस्ताद् दृङ् मोहकर्मण: ।
अस्ति तेनाविनाभूतं व्याप्तेः सद्भावतस्तयो: ॥870॥
दैवादस्तंगते तत्र सम्यक्त्वं स्यादनन्तरम् ।
दैवान्नान्यतरस्यापि योगवाही च नाप्ययम्‌ ॥871॥
सार्ध तेनोपयोगेन न स्याद्‌ व्याप्तिर्द्वयोरपि ।
विना तेनापि सम्यक्त्वं तदस्ते सति स्याद्यतः ॥872॥
सम्यक्त्वेनाविनाभूता येऽपि ते निर्जरादयः ।
समं तेनोपयोगेन न व्याप्तास्ते मनागपि ॥873॥
सत्यत्र निर्जरादीनामवश्यम्भावलक्षणम्‌ ।
सद्भावोऽस्ति नासद्भावो यत्स्याद्वा नोपयोगि तत्‌ ॥874॥
आत्मन्येवोपयोग्यस्तु ज्ञानं वा स्यात् परात्मनि ।
सत्सु सम्यक्त्वभावेषु सन्ति ते निर्जरादयः ॥875॥
यत्पुनः श्रेयसो बन्धो बन्धश्चाश्रेयसोऽपि वा ।
रागाद्वा द्वेषतो मोहात्‌ स स्यात्‌ स्यान्नोपयोगसात् ॥876॥
व्याप्तिर्बन्धस्य रागाद्यैर्नाव्याप्तिर्विकल्पैरिव ।
विकल्पैरस्य चाव्याप्तिर्न व्याप्तिः किल तैरिव ॥877॥
नानेकत्वमसिद्धं स्यान्न स्याद् व्याप्तिर्मिथोऽनयोः ।
रागादेश्चोपयोगस्य किन्तूपेक्षास्ति तद्द्वयो: ॥878॥
कालुष्यं तत्र रागादिर्भावश्चौदयिको यतः ।
पाकाच्चारित्रमोहस्य दृङ् मोहस्याथ नान्यथा ॥879॥
क्षायोपशमिकं ज्ञानमुपयोगः स उच्यते ।
एतदावरणस्योच्चै: क्षयाद्वोपशमाद्यतः ॥880॥
अस्ति स्वहेतुको रागो ज्ञानं चास्ति स्वहेतुकम् ।
दूरे स्वरूपभेदत्वादेकार्थत्वं कुतोऽनयो: ॥881॥
किञ्च ज्ञानं भवदेव भवतीदं न चापरम् ।
रागादयो भवन्तश्च भवन्त्येते न चिद्यथा ॥882॥
अभिज्ञानं च तत्रास्ति वर्धमाने चिति स्फुटम् ।
रागादीनामभिवृद्धिर्न स्याद्‌ व्याप्तेरसम्भवात्‌ ॥883॥
अन्वयार्थ : उपयोग सम्यग्दर्शन आदि किसी की उत्पत्ति में हेतु नहीं है-
दर्शनमोहनीय कर्म का उपशम, क्षय या क्षयोपशम होने से जीव का सम्यक्त्व भाव प्रकट होता है। इसका दर्शनमोहनीय के उपशमादिक के साथ अविनाभाव सम्बन्ध है क्‍योंकि इन दोनों की व्याप्ति पाई जाती है॥८७०॥ दैववश दर्शनमोहनीय का अभाव ( उपशमादि ) होने पर तदनन्तर सम्यग्दर्शन गुण प्रकट होता है और दैववश दर्शनमोहनीय का अभाव नहीं होने पर सम्यग्दर्शन गुण प्रकट भी नहीं होता है । इससे प्रतीत होता है कि यह उपयोग इनमें से किसी एक का भी योगवाही नहीं है॥८७१॥ उस उपयोग के साथ दोनों की व्याप्ति भी नहीं है, क्योंकि उपयोग के बिना भी दर्शनमोहनीय का अभाव होने पर सम्यक्त्व गुण प्रकट होता हुआ पाया जाता है ॥।८७२॥ इसी प्रकार जिन निर्जरादिक का सम्यक्त्व के साथ अविनाभाव सम्बन्ध पाया जाता है उनकी उपयोग के साथ थोड़ी भी व्याप्ति नहीं है ॥८७३॥ उस समय चाहे उपयोग हो चाहे न हो किन्तु सम्यक्त्व के होने पर निर्जरादिक अवश्य होते हैं उनका अभाव नहीं किया जा सा सकता॥८७४॥ ज्ञान चाहे आत्मा में उपयुक्त हो चाहे परात्मा में उपयुक्त हो। किन्तु तब सम्यक्त्व रूप भावों के होने पर वे निर्जरादिक होते ही हैं॥८७५॥ इसी प्रकार जितना भी पुण्यबन्ध और पापबन्ध है वह राग, द्वेष और मोह से होता है। वह उपयोग के आधीन नहीं है॥८७६॥ बन्ध की व्याप्ति रागादिक के साथ है ज्ञान विकल्पों के समान रागादिक के साथ उसकी अव्याप्ति नहीं है । और ज्ञान विकल्पों के साथ बन्ध की अव्याप्ति है, रागादिक के समान ज्ञान विकल्पों के साथ उसकी व्याप्ति नहीं है॥८७७॥ राग और उपयोग ये भिन्‍न भिन्न हैं यह बात असिद्ध नहीं है और न इन दोनों की परस्पर में व्याप्ति ही है किन्तु इन दोनों में उपेक्षा है। अर्थात्‌ इनमें से कोई एक किसी दूसरे की अपेक्षा नहीं करता॥८७८॥ इन दोनों में से रागादिक का अर्थ कलुषता है। यह औदायिक भाव है , क्‍योंकि यह चारित्रमोहनीय और दर्शनमोहनीय के उदय से होता है अन्य प्रकार से नहीं॥८७९॥ और जो क्षायोपशमिक ज्ञान है वह उपयोग कहलाता है, क्‍योंकि यह ज्ञानावरण कर्म के विशिष्ट क्षयोपशम से होता है॥८८०॥ राग अपने हेतु से होता है और ज्ञान अपने हेतु से। स्वरूप भेद से जब कि ये पृथक पृथक हैं तब फिर ये एक कैसे हो सकते हैं॥८८१॥ दूसरे जब ज्ञान होता है तब ज्ञान ही होता है अन्य नहीं। और जब रागादिक होते हैं तब रागादिक ही होते हैं ज्ञान नहीं ॥८८२॥ इस विषय में उदाहरण यह है कि ज्ञान की वृद्धि होने पर रागादिक की वृद्धि नियम से नहीं होती है, क्योंकि ज्ञान की वृद्धि के साथ रागादिक की वृद्धि का अविनाभाव नहीं पाया जाता॥८८३॥