वर्धमानेषु चैतेषु वृद्धिर्ज्ञानस्य न क्वचित्‌ ।
अस्ति यद्वा स्वसामग्र्यां सत्यां वृद्धि: समाद्वयोः ॥884॥
ज्ञानेऽथ वर्धमानेऽपि हेतो: प्रतिपक्षक्षयात्‌ ।
रागादीनां न हानिः स्याद्धेतो: मोहोदयात्‌ सत: ॥885॥
यद्वा द्वैवात्तत्सामग्रयां सत्यां हानिः समं द्वयो: ॥
आत्मीयात्मीयहेतोर्या ज्ञेया नान्योन्यहेतुतः॥886॥
व्याप्तिर्वा नोपयोगस्य द्रव्यमोहेन कर्मणा ।
रागादीनां तु व्याप्तिः स्यात्‌ संविदावरणै: सह॥887॥
अन्वयव्यतिरेकाभ्यामेषा स्याद्विषमैव तु ।
न स्यात्‌ समा तथा व्याप्तिर्हेतोरन्यतरादपि॥888॥
व्याप्तेरसिद्धि: साध्यात्र साधनं व्यभिचारिता ।
सैकस्मिन्नपि सत्यन्यो न स्यात्स्याद्वा स्वहेतुतः॥889॥
व्याप्तित्त्वं साहचर्यस्य नियम: स यथा मिथः ।
सति यत्र यः स्यादेव न स्यादेवासतीह यः॥890॥
मा समा रागसद्भावे नूनं बन्धस्य सम्भवात्‌ ।
रागादीनामसद्भावे बन्धस्यासम्भवादपि ॥891॥
व्याप्तिः सा विषमा सत्सु संविदावरणादिषु ।
अभावाद्रागभावस्य भावाद्वास्य स्वहेतुतः ॥892॥
अव्याप्तिश्चोपयोगेऽपि विद्यमानेऽष्टकर्मणाम् ।
बन्धो नान्यतमस्यापि नाबन्धस्तत्राप्यसति ॥893॥
यद्वा स्वात्मोपयोगीह क्वचिन्नानुपयोगवान्‌ ।
व्यतिरेकावकाशोऽपि नार्थादत्रास्ति वस्‍तुतः ॥894॥
सर्वत्रश्चोपसंहार: सिद्धश्चैतावतात्र वै ।
हेतुः स्यान्नोपयोगोऽयं दृशो वा बन्धमोक्षयो: ॥895॥
अन्वयार्थ : और रागादिक की वृद्धि होने पर कहीं भी ज्ञान की वृद्धि नहीं होती । अथवा अपनी अपनी सामग्री के मिलने पर इन दोनों की वृद्धि एक साथ होती है । ८८४॥ ज्ञान के प्रतिपक्षी कर्म का क्षय होने से ज्ञान की वृद्धि होने पर भी मोहनीय कर्म का उदय रहने से रागादिक की हानि नहीं भी होती है ॥८८५॥ अथवा दैववश अपनी अपनी हानि के योग्य सामग्री के मिलने पर दोनों की जो एकसाथ हानि होती है वह अपने अपने कारणों से ही होती है एक दूसरे के कारणों से नहीं॥८८६॥ अथवा उपयोग की द्रव्य मोहनीय कर्म के साथ व्याप्ति नहीं है । हाँ ज्ञानावरण के साथ रागादिक की व्याप्ति अवश्य है॥८८७॥ किन्तु अन्वय और व्यक्तिरेक दोनों प्रकार से इनकी विषम व्याप्ति ही है, किसी भी कारण से इनकी समव्याप्ति नहीं है॥८८८॥ प्रकृत में व्याप्ति की असिद्धि साध्य है और व्यभिचारीपन हेतु है। और वह व्यभिचारीपना इस प्रकार घटित होता है कि एक के रहने पर दूसरा नहीं होता है। यदि होता है तो अपने अपने कारण से होता है। आशय यह है कि ज्ञान और राग में सम व्याप्ति नहीं बनती, क्योंकि ऐसा मानने पर व्यभिचार दोष आता है॥८८९॥ परस्पर में साहचर्य सम्बन्ध का नाम व्याप्ति है । जैसे जिसके होने पर जो होता ही है और जिसके नहीं होने पर जो नहीं ही होता है॥८९०॥ राग के सद्भाव में बन्ध नियम से होता है और रागादिक के अभाव में बन्ध नहीं होता, इसलिए यहाँ पर समव्याप्ति नहीं है ॥८९१॥ किन्तु विषम व्याप्ति इसलिए है कि ज्ञानावरणादि कर्मों के रहने पर भी रागभाव का अभाव पाया जाता है। यदि रागादि का सद्भाव पाया भी जाता है तो इसका अपने कारणों से ही सद्भाव पाया ज्ञाता है ॥८९२॥ तथा उपयोग के रहने पर भी ज्ञानावरण आदि आठ कर्मों का या उनमें से किसी एक का बन्ध नहीं होता है और उपयोग के नहीं रहने पर भी उनका बन्ध रुकता नहीं। इससें ज्ञात होता है कि उपयोग के साथ ज्ञानावरणादि आठ कर्मों के बन्ध की व्याप्ति नहीं है ॥८९३॥ अथवा सम्यग्दृष्टि जीव सदा ही स्वोपयोग सहित है उपयोग से रहित किसी भी अवस्था में नहीं है , इसलिये वास्तव में यहां व्यतिरेक के लिए अवकाश ही नहीं है ॥८९४॥ इतने कथन से यहां पर सम्पूर्णतया यही सारांश सिद्ध होता है कि यह उपयोग न तो सम्यग्दर्शन का ही कारण है और न बन्ध मोक्ष का ही कारण है॥८९५॥