+ शंका -- क्या जो वीतराग सम्यग्दृष्टि हैं उसी के ज्ञान चेतना होती है, क्योंकि जब आत्मा के सिवा किन्हीं बाह्य पदार्थों में ज्ञानोपयोग होता है तब ज्ञानचेतना की क्षति नियम से सिद्ध होती है? -
ननु चैवं स एवार्थो यः पूर्वं प्रकृतो यथा ।
कस्यचिद्वीतरागस्य सद्दृष्टेर्ज्ञानचेतना ॥896॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार तो वही अर्थ फलित होता है जो पहले प्रकरण में आ चुका हैं। जैसे कि पहले यह कहा जा चुका है कि जो वीतराग सम्यग्दृष्टि हैं उसी के ज्ञान चेतना होती है, क्योंकि जब आत्मा के सिवा किन्हीं बाह्य पदार्थों में ज्ञानोपयोग होता है तब ज्ञानचेतना की क्षति नियम से सिद्ध होती है?