
आत्मनोऽन्यत्र कुत्रापि स्थिते ज्ञाने परात्मसु ।
ज्ञानसंचतेनायाः स्यात्क्षतिः साधीयसी तदा ॥897॥
सत्यं चापि क्षतेरस्याः क्षतिः साध्यस्य न क्वचित् ।
इयानात्मोपयोगस्य तस्यास्तत्राप्यहेतुता ॥898॥
साध्यं यद्दर्शनाद्धेतोर्निर्जरा चाष्टकर्मणाम् ।
स्वतो हेतुवशाच्छक्तेर्न तद्धेतु: स्वचेतना ॥899॥
अन्वयार्थ : यह कहना ठीक है तथापि किसी जीव के ज्ञानचेतना का अभाव होने मात्र से आठ कर्मों की निर्जरा रूप साध्य की क्षति नहीं होती है। ज्ञान चेतना का कर्म निर्जरा में भी कारण न होना यही उपयोग का स्वरूप है ॥८९७-८९८॥ प्रकृत में साध्य आठों कर्मों की निर्जरा है क्योंकि वह सम्यग्दर्शन के निमित्त से होती है। ऐसा स्वभाव है कि प्रत्येक शक्ति अपने कारण से होती इसीलिए उसका कारण ज्ञान चेतना नहीं है ॥८९९॥