सत्यं विकल्पसर्वस्वसारं ज्ञानं स्वलक्षणात् ।
सम्यकत्वे यद्विकल्पत्वं न तत्सिद्धं परीक्षणात्‌ ॥901॥
यत्पुनः केश्चिदुत्कं स्यात्स्थूललक्ष्योन्मुखैरिह ।
अत्रोपचारहेतुर्यस्तं ब्रुवे किल साम्प्रतम् ॥902॥
अन्वयार्थ : शंका- सम्यक्त्व और ज्ञान को जो विकल्पात्मक बतलाया है सो यह विकल्प आकाशफूल के समान आश्रयासिद्ध है। तब फिर यह बतलाइये कि सर्वज्ञ देव के आगमानुसार ऐसा कौन सा अबाधित हेतु सिद्ध है जिससे यह जाना जा सके कि सम्यक्त्व और ज्ञान विकल्पात्मक है ?
समाधान- यह कहना ठीक है तथापि ज्ञान अपने लक्षण के अनुसार विकल्परूप माना गया है। किन्तु सम्यक्त्व में जो विकल्प का व्यवहार होता है वह परीक्षा करने पर भी सिद्ध नहीं होता॥९००-९०१॥
विशेषार्थं—सम्यग्ज्ञान की महिमा का निर्देश करते समय यह बतला आये हैं कि सम्यग्दर्शन, राग, बन्ध, निर्जरा या संवर अपने अपने कारणों से होते हैं. इनका कारण उपयोग नहीं है। यहाँ इसी विषय को और अधिक स्पष्ट किया गया है। सम्यग्दर्शन का कारण दर्शन मोहनीय का उपशम, क्षय या क्षयोपशम है जो जीव के उसकी योग्यतानुसार प्रकट होता है । राग द्वेष का कारण भी उसकी आन्तरिक परिणति है। बन्ध का कारण राग द्वेष और मोह है। संवर का कारण मुख्यतया सम्यग्दर्शन या चारित्र है और निर्जरा के कारण भी यही हैं, क्योंकि इनको उक्त कारणों के साथ व्याप्ति पाई जाती है पर
उपयोग के साथ इनमें से किसी एक की व्याप्ति नहीं पाई जाती। उपयोग रहता है पर इनमें से कोई नहीं होता और उपयोग नहीं भी रहता है पर यथायोग्य ये पाये जाते हैं, इसलिये उपयोग को इनका कारण नहीं मानना चाहिये। यही कारण है कि ज्ञानचेतना का सद्भाव और अभाव राग के असद्भाव और सद्भाव पर अवलम्बित नहीं माना गया है। इसलिये सम्यक्त्व के सराग और वीतराग ये भेद करना और मात्र वीतराग के ज्ञानचेतना कहना उचित नहीं है। जो आचार्य राग के आधार से इस प्रकार का विभागीकरण करते है मालूम होता है कि वे वास्तविकता से कोसों दूर हैं। ज्ञान विकल्पात्मक होता है यह सही है पर इसका कारण रागभाव न होकर उसका स्वरूप है । फिर भी सम्यक्त्व को तो किसी भी हालत में सविकल्प नहीं माना जा सकता है । वह जीव की ऐसी अवस्था है जो सदा काल किसी भी प्रकार के विकल्प से परे है । वह छद्मस्थों के अनुभवगम्य और केवल ज्ञानियों के प्रत्यक्षगम्य है। राग, उपयोग और सम्यग्दर्शन एक ही आत्मा में प्रकट होते हैं पर इनका सांकर्य करके एक के स्वभाव को दूसरे पर आरोपित करना उचित नहीं है । इस प्रकार इतने विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि सम्यग्दर्शन के सविकल्प और निर्विकल्प ऐसे दो भेद करना या सराग सम्यग्दर्शन और वीतराग सम्यग्दर्शन ऐसे दो भेद करना उचित नहीं हे। इसी प्रकार राग के कारण ज्ञान को भी सविकल्प मानना उचित नहीं है॥८७८-९०१॥
सम्यक्त्व में विकल्प व्यवहार करने का कारण उपचार है -
किन्तु किन्हीं स्थूलदृष्टिवाले पुरुषों ने सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान को उपचार से सविकल्प कहा है सो यहाँ उपचार का क्या कारण है इसी बात को अब आगे बतलाते हैं॥९०२॥