+ सम्यक्त्व के सद्भाव में होने वाले गुण -
एवमित्यादयश्चान्ये सन्ति ये सदगुणोपमाः ।
सम्यक्त्वमात्रमारम्य ततोऽप्पूर्ध्वम् च तद्वतः ॥936॥
स्वसंवेदनप्रत्यक्षं ज्ञानं स्वानुभवाह्वयम् ।
वैराग्यं भेदविज्ञानमित्याद्यस्तीह किं बहु ॥937॥
अद्वैतेऽपि त्रिधा प्रोक्ता चेतना चैवमागमात् ।
ययोपलक्षितो जीव: सार्थनामाऽस्ति नान्‍यथा ॥938॥
अन्वयार्थ : सम्यक्त्व के सद्भाव में होनेवाले सदगुण-
इस प्रकार ये निःशंकित आदि तथा अन्य जितने गुण हैं वे सब सद्गुण माने गये हैं। ये सम्यक्त्व के होने पर होते हैं और आगे भी सम्यग्दृष्टि के पाये जाते हैं॥९३६॥ स्वसंवेदन प्रत्यक्ष, स्वानुभवज्ञान, वैराग्य और भेदविज्ञान इत्यादि वे गुण हैं जो सम्यग्दर्शन के होने पर नियम से होते हैं । इस विषय में अधिक क्या कहूँ॥९३७॥
विशेषार्थ - यहाँ सम्यग्दर्शन के ऐसे गुणों का निर्देश किया है जो उसके सद्भाव में नियम से होते हैं। पहले निःशंकित आदि गुण बता आये हैं। यहाँ उनके सिवा कुछ अन्य आवश्यक गुणों का संकेत किया है। सम्यग्दृष्टि को आत्मानुभूति होने लगती है। वह संसार और संसार के कारणों को भी अच्छी तरह जान लेता हैं। वह यह भी जानने लगता है कि स्व क्या है और पर क्या है। इसलिये उसके जीवन में स्वानुभव प्रत्यक्ष और वैराग्य आदि गुणों का उदय होना स्वाभाविक है॥९३६-९३७॥
तीन प्रकार की चेतना ही जीव का लक्षण है-
चेतना एक होकर भी आगम में वह तीन प्रकार की कही गई है । जिससे उपलक्षित होने के कारण ही जीव सार्थक नामवाला है अन्य प्रकार से नहीं ॥९३८॥
विशेषार्थ - यहाँ चेतना के तीन भेद निमित्त की मुख्यता से किये गये हैं। इनमें से कोई न कोई भेद जीव के अवश्य पाया जाता है । एकेन्द्रिय आदि के कर्म फल चेतना यह भेद पाया जाता है। संज्ञी आदि के कर्म चेतना यह भेद प्रमुखता से पाया जाता है और सम्यग्दृष्टि आदि के ज्ञानचेतना यह भेद मुख्यता से पाया जाता है। जीव यह नाम चेतना के कारण ही सार्थक है यह उक्त कथन का तात्पर्य है ॥९३८॥