उच्यतेऽनन्तधर्माधिरूढोऽप्येक: सचेतनः ।
अर्थजातं यतो यावत्स्यादनन्तगुणात्मकम्‌ ॥940॥
अभिज्ञानं च तत्रापि ज्ञातव्यं तत्परीक्षकै: ।
वक्ष्यमाणमपि साध्यं युक्तिस्वानुभवागमात्‌ ॥941॥
तद्यथायथं जीवस्य चरित्रं दर्शनं सुखम् ।
ज्ञानं सम्यक्त्वमित्येते स्युर्विशेषगुणा: सफुटम् ॥942॥
वीर्यं सूक्ष्मोऽवगाहः स्यादव्यावाधश्चिदात्मकः ।
स्यादगुरुलघुसंज्ञं च स्यु: सामान्यगुणा इमे ॥943॥
अन्वयार्थ : प्रत्येक जीव अनन्त धर्म वाला कहा गया है, क्योंकि जितना भी पदार्थ समूह है वह सब अनन्तगुणात्मक है ॥९४०॥ यद्यपि आगे युक्ति, स्वानुभव और आगमसे साध्यभूत जीव का विचार करने वाले हैं तथापि इसकी परीक्षा करनेवालों को विशेष चिन्ह द्वारा इसे जानना चाहिये ॥९४१॥ यथा- जीव के चारित्र, दर्शन, सुख, ज्ञान और सम्यक्त्व ये स्पष्टतः विशेष गुण हैं ॥९४२॥ और वीर्य, सूक्ष्मत्व, अवगाहनत्व, अव्याबाध और अगुरुलघु ये जीव के सामान्य गुण हैं ॥९४३॥