


सामान्या वा विशेषा वा गुणा: सिद्धाः निसर्गतः।
टंकोत्कीर्णा इवाजस्रम् तिष्ठन्तः प्राकृताः स्वतः ॥944॥
तथापि प्रोच्यते किन्चिच्छुयतामवघानतः।
न्यायबलात्समायातः प्रवाह: केन वार्यते ॥945॥
अस्ति वैभाविकी शक्ति: स्वतस्तेषु गुणेषु च ।
जन्तोः संसृत्यवस्थायां वैकृतास्ति स्वहेतुतः ॥946॥
यथा वा स्वच्छतादर्शे प्राकृतास्ति निसर्गतः ।
तथाप्यस्यास्यसंयोगाद्वैकृतास्त्यर्थतोऽपि सा ॥947॥
वैकृतत्वेऽपि भावस्य न स्यादर्थान्तरं क्वचित् ।
प्रकृतौ यद्विकारत्वं वैकृतं हि तदुच्यते ॥948॥
यथा दि वारुणीपानाद्धुद्धिर्नाबुद्धिरेव नु: ।
तत्प्रकारान्तरं बुद्धौ वैकृतत्त्वं तदर्थसात् ॥949॥
प्राकृतं वैकृतं वापि ज्ञानमात्रम् तदेव यत् ।
यावदत्रेन्द्रियायत्तं तत्सर्वं वैकृतं विदु: ॥950॥
अस्ति तत्र क्षतिर्नूनं नाक्षतिर्वास्तवादपि ।
जीवस्यातीव दुःखित्वासुखस्योन्मूलनादपि ॥951॥
अपि द्रव्यनयादेशात् टंकोत्कीर्णोऽस्ति प्राणभृत्त ।
नात्मसुखे स्थितः कश्चित् प्रत्युतातीव दुःखवान् ॥952॥
नांगीकर्तव्यमेवैतत् स्वस्वरूपे स्थितोऽस्ति ना ।
बद्धो वा स्यादबद्धो वा निर्विशेषाद्यथा मणि: ॥953॥
यतश्चैवं स्थिते जन्तोः पक्षः स्याद्वाधितो बलात् ।
संसृतिर्वा विमुक्तिर्वा न स्याद्वा स्यादभेदसात् ॥954॥
स्वस्वरूपे स्थितो ना चेत् संसारः स्यात्कुतो नयात् ।
हटाद्वा मन्यमानेऽस्मिन्ननिष्टत्वमहेतुकम् ॥955॥
जीवश्चेत्सर्वत: शुद्धो मोक्षादेशो निरर्थक: ।
नेष्टमिष्टत्वमत्रापि तदर्थ वा वृथा श्रमः ॥956॥
सर्वं विप्लवतेऽप्येवं न प्रमाणं न तत्फलम् ।
साधनं साध्यभावश्च न स्याद्वा कारकक्रिया ॥957॥
सिद्धमेतावताप्येवं वैकृता भावसन्ततिः ।
अस्ति संसारिजीवानां दुःखमूर्तिर्दुरुत्तरी ॥958॥
अन्वयार्थ : यद्यपि सामान्य और विशेष दोनों प्रकार के गुण निसर्ग सिद्ध है। वे स्वभाव से प्राकृत है और टन्कोत्कीर्ण की तरह सदा रहते हैं ॥९४४॥ तथापि उनका कुछ विचार करते हैं। उसे सावधानी से सुनना चाहिये, क्योंकि युक्ति से जिस प्रवाह का समर्थन किया जाता है उसे कौन रोक सकता है ॥९४५॥ उन गुणों में स्वतः सिद्ध एक वैभाविकी शक्ति है जो जीव के संसार अवस्था में अपने कारण से विकृत बनी रहती है ॥९४६॥ जैसेकि दर्पण में स्वच्छता निसर्ग सिद्ध होती है । स्वच्छता के लिये अन्य निमित्त नहीं लगता। और जैसे मुख के संयोग से इसमें विकृति पैदा हो जाती है वैसे ही वैभाविकी शक्ति के विषय में वास्तव में समझना चाहिये ॥९४७॥ यद्यपि पदार्थ में विकृति आ जाती है तो भी वह अन्यरूप नहीं हो जाता है। वास्तव में प्रकृति में जो विकारीपन आ जाता है उसे ही विकृति कहते हैं ॥९४८॥ जिस प्रकार मदिरा पीने से मनुष्य की बुद्धि अबुद्धि नहीं हो जाती है। किन्तु इससे बुद्धि में एक दूसरी अवस्था उपन्न हो जाती है। वही उसकी वास्तविक विकृति है उसी प्रकार प्रकृत में जानना चाहिये ॥९४९॥ चाहे ज्ञान प्राकृत हो या विकृत, वह सभी ज्ञान मात्र ही है। जितना ज्ञान इन्द्रियाधीन है उसे विकृत ही जानना चाहिये ॥९५०॥ ऐसा होने से जीव को नियम से हानि ही होती है। इससे वास्तव में लाभ कुछ भी नहीं है, क्योंकि इसके रहने पर जीव अत्यन्त दुखी बना रहता है और उसके आत्मीय सुख का उन्मूलन हो जाता है ॥९५१॥ यद्यपि द्रव्यार्थिकनय की अपेक्षा जीव टन्कोत्कीर्ण होता है तो भी ऐसी अवस्था में कोई जीव आत्मसुख में स्थिर नहीं रहता प्रत्युत वह अतीव दुखी बना रहता है ॥९५२॥ यहाँ यह पक्ष भी नहीं अंगीकार करना चाहिये कि जिस प्रकार मणि चाहे बद्ध हो या अबद्ध हो वह सदा एकसा बना रहता है। उसी प्रकार यह जीव भी सदा अपने स्वरूप में स्थिर रहता है ॥९५३॥ क्योंकि जीव की ऐसी स्थिति मानने पर यह पक्ष नियम से बाधित हो जाता है। तब न संसार रहता है और न मोक्ष ही ठहरता है। उन दोनों में अभेद हो जाता है ॥९५४॥ यदि जीव सदा अपने स्वरूप में स्थिर रहता है ऐसा माना जाय तो संसार किस नय से बन सकेगा। यदि इसे हठपूर्वक स्वीकार किया जाता है तो बिना हेतु के अनिष्ट का प्रसंग आता है ॥९५५॥ यदि जीव सब प्रकार से शुद्ध है ऐसा माना जाता है तो मोक्ष का कथन करना निरर्थक ठहरता है । यदि कहा जाय कि प्रकृत में ऐसा मान लेना इष्ट है सो भी बात नहीं है, क्योंकि इस प्रकार तो मोक्ष के लिये जो श्रम किया जाता है वह व्यर्थ ठहरता है ॥९५६॥ तथा ऐसा मानने पर सभी व्यवस्था बिगड़ जाती है न प्रमाण बनता है, न उसका फल बनता है, साधन, साध्य, कारक और क्रिया ये कुछ भी नहीं बनते ॥९५७॥ इस तरह पूर्वोक्त कथन से यह बात सिद्ध होती है कि संसारी जीवों के भावसन्तति विकृत है, दुःख की मूर्ति है और खोटे फलवाली है ॥९५८॥