श्रणु साधो महाप्राज्ञ ! वच्म्यहं यत्तवेप्सितम्‌ ।
प्रायो जैनागमाभ्यासात् किन्चित्स्वानुभवादपि ॥960॥
लोकासंख्यातमात्रा: स्युर्भावाः सूत्रार्थविस्तरात्‌ ।
तेषां जातिविवक्षायां भावाः पन्च यथोदिताः ॥961॥
तत्रौपशमिको नाम भावः स्यात्क्षायिकोपि च ।
क्षायोपशमिकश्चेति भावोऽप्यौदयिकोऽस्ति नु: ॥962॥
पारिणामिकभावः स्यात्‌ पंचेत्युद्देशिताः क्रमात्‌ ।
तेषामुत्तरभेदाश्च त्रिपंचशदितीरिता: ॥963॥
अन्वयार्थ : हे साधो हे महाप्राज्ञ ! जो तुम्हें अभीष्ट है उसमें से बहुत कुछ तो मैं जैनागम के अभ्यास से कहता हूँ, और कुछ स्वानुभव के बल से भी कहता हूँ, सुनो ॥९६०॥ यद्यपि संक्षिप्त भावों को विस्तार से देखा जाय तो वे असंख्यात लोक प्रमाण प्राप्त होते हैं किन्तु उनकी जाति की विवक्षा करने पर वे पांच प्रकार के कहे गये हैं ॥९६१॥ उनमें से पहला औपशमिक भाव है , दूसरा क्षायिक भाव है, तीसरा क्षायोपशमिक भाव है, चौथा औदयिक भाव है और पांचवां पारिणामिक भाव है, इस प्रकार क्रम से पांच भाव कहे गये हैं। और इनके उत्तर भेद त्रेपन कहे गये हैं ॥९६२-९६३॥