कर्मणां प्रत्यनीकानां पाकस्योपशमात्स्वतः।
यो भाव: प्राणिनां स स्यादौपशमिकसंज्ञक: ॥964॥
यथास्वं प्रत्यनीकानां कर्मणां सर्वत: क्षयात् ।
जातो यः क्षायिको भावः शुद्ध: स्वाभाविकोऽस्य सः ॥965॥
यो भावः सर्वतो घातिस्पर्धकानुदयोद्भव: ।
क्षायोपशमिकः स स्यादुदयाद्देशघातिनाम्‌ ॥966॥
कर्मणामुदयाद्यः स्याद्भावो जीवस्य संसृतौ ।
नाम्नाप्यौदयिकान्वर्थात्परं बन्धाधिकारवान्‌ ॥967॥
कृतस्नकर्मनिरपेक्ष: प्रोक्तावस्थाचतुष्टयात् ।
आत्मद्रव्यत्वमात्रात्मा भाव: स्यात्पारिणामिक: ॥968॥
अन्वयार्थ : पाँच भावों का स्वरूप—
विपक्षी कर्मों के पाक का स्वयं उपशम होने से प्राणियों के जो भाव होता है उसकी ओपशमिक संज्ञा है॥९६४॥ यथायोग्य विपक्षी कर्मों के सर्वथा क्षय होने से जो भाव उत्पन्न होता है वह जीव का शुद्ध और स्वाभाविक क्षायिक भाव है॥९६५॥ जो भाव सर्वघाति स्पर्धकों के अनुदय से और देशघाति स्पर्धकों के उदय से उत्पन्न होता है वह क्षायोपशमिक भाव है॥९६६॥ संसार में कर्मों के उदय से जीव का जो भाव होता है वह औदयिक भाव है। यह उसका अन्वर्थ नाम है और एक मात्र यही भाव बन्ध में अधिकारी माना गया है॥९६७॥ सब कर्म की जो पहले चार अवस्थाएँ कही गई हैं उनकी अपेक्षा के बिना आत्म द्रव्य सापेक्ष जो भाव होता है वह पारिणामिक भाव है॥९६८॥
विशेषार्थ - यहां औपशमिक आदि पांच भावों के स्वरूप को निर्देश किया गया है। कर्मों के सत्ता में रहते हुए अपना कार्य न करना उपशम है। इसके दो भेद हैं- अन्तरकरण उपशम और सदवस्था उपशम। औपशमिक भाव में अन्तरकरण उपशम ही विवक्षित है। अन्तरकरण में, जब उपशम भाव रहता है तब, विवक्षित कर्म का अन्तर हो जाता है। वह कर्म उपशम काल से आगे की स्थिति में रहता है और सदवस्था उपशम में विवक्षित कर्म का फल नहीं मिलता। वह प्रति समय सजातीय प्रकृति रूप से ही अपना काम करता है। जैसा उसका नाम है वैसा वह काम नहीं करता । उदाहरणार्थ- अनन्तानुबन्धी का सदवस्था उपशम रहने पर अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया और लोभ भाव प्रकट नहीं होता। अन्तरकरण उपशम दर्शनमोहनीय का और अनन्तानुबन्धी के सिवा शेष चरित्रमोहनीय का ही होता है शेष कर्मों का नहीं और सदवस्था उपशम यथासम्भव घातिया कर्मों का होता है। जिस प्रकृति का आबाधाकाल पूरा होकर उदय और उदीरणा होना सम्भव है फिर भी जिसका उदय और उदीरणा न होकर अनुदय रहता है उसका सदवस्था उपशम होता है। सदवस्था उपशम इस शब्द का व्यवहार मुख्यतया क्षयोपशम भाव के समय ही किया जाता है। यहां उपशम भाव की व्याख्या करते समय ग्रन्थकार ने कम पाक का उपशम बतलाया है सो यह उपशम भाव की सामान्य व्याख्या है । औपशमिक भाव में तो अन्तरकरण उपशम की ही मुख्यता है और इसमें यथासम्भव प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश चारों का उपशम होता है। इतनी विशेषता है कि दर्शनमोहनीय का संक्रमण होता रहता है। कहीं कहीं कर्म का अनुदय भी उपशम कहलाता है। उदाहरणार्थ- औपशमिक सम्यक्त्व में अनन्तानुबन्धी का अनुदय रहता है फिर भी उसको उपशम संज्ञा दी गई है। क्षायोपशामिक भाव कर्म के क्षयोपशम से होता है। इसमें सर्वघाति स्पर्धकों का उदयाभावी क्षय और उपशम तथा देशघाति स्पर्धकों का उदय रहता है। क्षायिक और औदयिक भाव का अर्थ स्पष्ट है। पारिणामिक भाव में कर्म की निमित्तता नहीं होती। यह अवस्था विशेष है। जिस जीव का कर्म बन्ध अनादि सान्‍त होता है या ऐसी योग्यतावाला होता है वह भव्य कहलाता है। जिसका कर्म बन्ध अनादि अनन्त होता है वह अभव्य कहलाता है और जो प्राण धारण पर्याय से युक्त होता है वह जीव कहलाता है यह पारिणामिक भाव का मथितार्थ है। इस तरह जीव के वैभाविक भाव कुल पांच प्रकार के ही होते हैं। यद्यपि क्षायिक भाव जीव के स्वभाव रूप होते हैं। उन्हें विभाव मानना उचित नहीं फिर भी क्षायिक ऐसा व्यवहार निमित्त सापेक्ष होता है इसलिये क्षायिक भावों की परिगणना विभावों में की गई है । पारिणामिक भावों में तो कर्म निरपेक्षता ही मुख्य प्रयोजक है। वैसे वे विभाव तो हैं ही॥९६४-९६८॥