इत्युक्तं लेशतस्तेषां भावानां लक्षणं पृथक् ।
इतः प्रत्येकमेतेषां व्यासात्तद्रूपमुच्यते ॥969॥
भेदाऔदयिकस्यास्य सूत्रार्थदेकविंशतिः ।
चतस्रो गतयो नाम चत्वारश्च कषायका: ॥970॥
त्रीणि लिंगानि मिथ्यात्वमेकं चाज्ञानमात्रकम् ।
एकं वाऽसंयतत्वं स्यादेकमेकास्त्यसिद्धता ॥971॥
लेश्या:षड़ेव कृष्णाद्या क्रमादुद्देशिता इति ।
तत्स्वरूपं प्रवक्ष्यामि नाल्‍पं नातीव विस्तरम्‌ ॥972॥
गतिनामास्ति कर्मैकं विख्यातं नामकर्मणि ।
चतस्रो गतयो यस्मात्तच्चतुर्घाऽघिगीयते ॥973॥
कर्मणोऽस्य विपाकाद्वा दैवादन्यतमं वपु: ।
प्राप्य तत्रोचितान्भावान्‌ करोत्यात्मोदयात्मनः ॥974॥
यथा तिर्यगवस्थायां तद्वद्या भावसन्ततिः ।
तत्रावश्यं च नान्यत्र तत्पर्यायानुसारिणी ॥975॥
एवं दैवेऽथ मानुष्ये नारके वपुषि स्फुटम् ।
आत्मीयात्मीयभावाश्च सन्त्यसाधारणा इव ॥976॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार उन भावों का संक्षेप में अलग अलग लक्षण कहा है। अब आगे उनमें से प्रत्येक का विस्तार से स्वरूप कहते हैं ॥९६९॥
सूत्र के अनुसार औदायिक भाव के इक्कीस भेद हैं। चार गति, चार कषाय, तीन लिंग, एक मिथ्यात्व, एक अज्ञान, एक असंयतत्व, एक असिद्धता और कृष्णादिक छह लेश्याएँ ये क्रम से इक्कीस भाव कहे गये हैं। अब न तो अति संक्षेप में और न अति विस्तार से उनका स्वरूप कहते हैं ॥९७०-९७२॥
नाम कर्म के भेदों में एक प्रसिद्ध गति नाम कर्म है। गतियां चार हैं, इसलिये इसके चार भेद कहे गये हैं ॥९७३॥ दैववश इस कर्म के विपाक से आत्मा किसी एक शरीर को प्राप्त कर इसके योग्य उदयरूप भावों को करता है ॥९७४॥ जैसेकि तिर्यंच अवस्था में तिर्यन्चो के समान उस पर्याय का अनुसरण करने वाली जो भाव परंपरा होती है वह वहीं होती है , अन्यत्र नहीं होती ॥९७५॥ इसी प्रकार देव, मनुष्य और नारक के शरीर में अपनी अपनी गति के योग्य भाव होते हैं जिनका अन्यत्र पाया जाना प्रायः असम्भव है ॥९७६॥