सत्यं तन्नामकर्मापि लक्षणाच्चित्रकारवत्‌ ।
नूनं तद्देहमात्रादि निर्मापयति चित्रवत्‌ ॥978॥
अस्ति तत्रापि मोहस्य नैरन्तर्योंदयोऽन्जसा ।
तस्मादौदयिको भावः स्यात्तद्देहक्रियाकृति: ॥979॥
अन्वयार्थ : यह कहना ठीक है फिर भी जिस प्रकार चित्रकार चित्र बनाता है उसी प्रकार वह नाम कर्म भी देवादि के शरीर आदि की रचना करता है। क्योंकि उस का लक्षण भी यही है ॥९७७-९७८॥ इतने पर भी वहाँ निरन्तर नियम से मोहनीय कर्म का उदय रहता है , इसलिये देवादि के शरीर की जैसी क्रिया होती है वैसा वहाँ औदायिक भाव होता है ॥९७९॥