नैवं यतोऽनभिज्ञोऽसि मोहस्योदयवैभवे ।
तत्रापि बुद्धिपूर्वे चाबुद्धिपूर्वे स्वलक्षणात्‌ ॥981॥
अन्वयार्थ : ऐसा नहीं है, क्‍योंकि मोहनीय कर्म का जो उदय वैभव है और उसमें भी वह जो अपने क्षण के अनुसार बुद्धिपूर्वक और अबुद्धि पूर्वक होता है इस विषय में तुम अनभिज्ञ हो ॥९८०-९८१॥