+ मोहनीय कर्म की व्युत्पत्ति और उसके भेद -
मोहनान्मोहकर्मैकं तद्‌ द्विधा वस्तुतः पृथक।
दृङ् मोहश्चात्र चारित्रमोहश्चेति द्विधा स्मृत: ॥982॥
एकधा त्रिविधा वा स्यात कर्म मिथ्यात्वसंज्ञकम्‌ ।
क्रोधाद्याद्यचतुष्कं च सप्तैते दृष्टिमोहनम्‌॥983॥
दृङ् मोहस्योदयादस्य मिथ्याभावोऽस्ति जन्मिनः।
स स्यादौदयिको नूनं दुर्वारो दृष्टिघातकः॥984॥
अस्ति प्रकृतिरस्यापि दृष्टिमोहस्य कर्मणः।
शुद्ध जीवस्य सम्यक्त्वं गुणं नयति विक्रियाम्‌॥985॥
यथा मद्यादिपानस्य पाकाद् बुद्धिर्विमुह्यति।
श्वेतं शंखादि यद्वस्तु पीतं पश्यति विभ्रमात्‌॥986॥
अन्वयार्थ : मोहनीय कर्म का स्वभाव मूर्च्छित करना है इसलिए वह एक प्रकार का है और वस्तुतः वह दो प्रकार का है क्योंकि उसके दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय ये दो भेद हैं ॥९८२॥ मिथ्यात्व कर्म एक होकर भी तीन प्रकार का है इसलिये तीन ये और आदि के चार क्रोधादिक ये सात दर्शनमोहनीय हैं ॥९८३॥
दर्शनमोहनीय के उदय से इस जीव के मिथ्यात्व भाव होता है। यह नियम से औदयिक है और सम्यक्त्व का घातक है। इसका वारण करना बड़ा कठिन है ॥९८४॥ इस दर्शनमोहनीय कर्म का ऐसा कुछ स्वभाव है जिससे वह जीव के शुद्ध सम्यक्त्व गुण को विकारी कर देता है ॥९८५॥ जिस प्रकार मदिरा आदि के पीने पर उसका जो परिपाक होता है उससे बुद्धि मूर्छित होती है और उस मूर्छावश जो शंख आदि वस्तु सफेद होती है उसे यह जीव पीला देखने लगता है ॥९८६॥