
तथा दर्शनमोहस्य कर्मणस्तूदयादिह ।
अपि यावदनात्मीयमात्मीयं मनुते कुदृक् ॥987॥
चापि लुम्पति सम्यक्त्वं दृङ् मोहस्योदयो यथा ।
निरुणद्धयात्मनो ज्ञानं ज्ञानस्यावरणोदयः ॥988॥
यथा ज्ञानस्य निर्णाशो ज्ञानस्यावरणोदयात् ।
तथा दर्शननिर्णाशो दर्शनावरणोदयात् ॥989॥
यथा धाराधराकारैगुंठितस्यांशुमालिनः ।
नाविर्भाव: प्रकाशस्य द्रव्यादेशात्सतोऽपि वा ॥990॥
यत्पुनर्ज्ञानमज्ञानमस्ति रूढिवशादिह ।
तन्नौदयिकमस्त्यस्ति क्षायोपशमिकं किल ॥991॥
अस्ति केवलज्ञानं यत्तदावरणावृतम् ।
स्वापूर्वार्थान् परिच्छेत्तुं नालं मूर्छितजन्तुवत् ॥992॥
यद्वा स्यादवधिज्ञानं ज्ञानं वा स्वान्तपर्ययम् ।
नार्थक्रियासमर्थं स्यात्तत्तदावरणावृतम् ॥993॥
मतिज्ञानं श्रुतज्ञानं तत्तदावरणावृतम् ।
यद्यावतोदयांशेन स्थितं तावदपन्हुतम् ॥994॥
यत्पुनः केवलज्ञानं व्यक्तं सर्वार्थभासकम् ।
स एव क्षायिको भावः कृतस्नस्वावरणक्षयात् ॥995॥
अन्वयार्थ : उसी प्रकार दर्शन मोहनीय कर्म के उदय से मिथ्यादृष्टि जीव जितने भी अनात्मीय भाव हैं उन्हें आत्मीय मानता है ॥९८७॥ जिस प्रकार दर्शनमोहनीय का उदय सम्यक्त्व गुण का घात करता है उसी प्रकार ज्ञानावरण कर्म का उदय आत्मा के ज्ञान गुण को रोकता है ॥९८८॥ जिस प्रकार ज्ञानावरण कर्म के उदय से ज्ञान का नाश होता है उसी प्रकार दर्शनावरण कर्म के उदय से दर्शन गुण का घात होता है ॥९८९॥ जिस प्रकार मेघों के द्वारा सूर्य के ढक जाने पर सामान्य से उसके रहते हुए भी उसके प्रकाश का आविर्भाव नहीं होता उसी प्रकार प्रकृत में जानना चाहिये ॥९९०॥ और जो यहाँ रूढिवश ज्ञान को अज्ञान कहा जाता है सो वह औदायिक नहीं है किन्तु क्षायोपशमिक ही है ॥९९१॥और जो केवलज्ञान केवलज्ञानावरण कर्म से आवृत है इसलिये वह मूर्छित प्राणी के समान स्व और अपूर्व अर्थ को जानने में समर्थ नहीं है ॥९९२॥ अथवा अवधिज्ञान या मनःपर्यय ज्ञान अपने अपने आवरण कर्म से आवृत रहने पर अपना अपना कार्य करने में समर्थ नहीं होते ॥९९३॥ इसी प्रकार मतिज्ञान और श्रुतज्ञान भी अपने अपने आवरण से आच्छादित हैं। उनका आवरणकर्म जितना उदयांशरूप से स्थित है उतना वह ज्ञान तिरोहित रहता है ॥९९४॥ किन्तु जो केवलज्ञान है वह व्यक्तरूप से सब पदार्थों का प्रकाशक है। वह अपने सब आवरण करने वाले कर्मों के क्षय से होता है इसलिये ज्ञानों में वही क्षायिक भाव है ॥९९५॥