
कर्माण्यष्टौ प्रसिद्धानि मूलमात्रतया पृथक् ।
अष्टचत्वारिंशच्छतं कर्माण्युत्तरसंज्ञया ॥996॥
उत्तरोत्तरभेदैश्च लोकासंख्यातमात्रकम् ।
शक्तितोऽनन्तसंज्ञं च सर्वकर्मकदम्बकम् ॥997॥
तत्र घातीनि चत्वारि कर्माण्यन्वर्थसंज्ञया ।
घातकत्वाद् गुणानां हि जीवस्यैवेति वाक् स्मृति: ॥998॥
ततः शेषचतुष्कं स्यात् कर्माघातिविवक्षया ।
गुणानां घातकाभावशक्तेरप्यात्मशक्तिवत् ॥999॥
अन्वयार्थ : मूल रूप से कर्म आठ प्रसिद्ध हैं और उनके उत्तर भेद एक सौ अड़तालीस हैं॥९९६॥ उत्तरोतर भेदों की अपेक्षा ये असंख्यात लोक प्रमाण हैं और शक्ति की अपेक्षा सब कर्म अनन्त हैं ॥९९७॥ इनमें चार घाति कर्म हैं। यह इनकी सार्थक संज्ञा है क्योंकि ये जीव के अनुजीवी गुणों का घात करते हैं, ऐसा आगम है ॥९९८॥ इनसे बचे हुए शेष चार कर्म अघाति कहलाते हैं। यद्यपि इनमें जीव के अनुजीवी गुणों को घातने की शक्ति नहीं है तो भी इनमें कर्म शक्ति पाई जाती है ॥९९९॥