+ ज्ञानावरणी -
वेदनाऽऽगन्तुका बाधा मलानां कोपतस्तनौ ।
भीतिः प्रागेव कम्पः स्यान्मोहाद्वा परिदेवनम्‌ ॥524॥
उल्लाघोऽहं भविष्यामि माभून्मे वेदना क्वचित् ।
मूर्च्छैव वेदनाभीतिश्चिन्तनं वा मुहुर्मुहुः ॥525॥
अस्ति नूनं कुदृष्टे सा दृष्टिदोषैकहेतुतः ।
नीरोगस्यात्मनोऽज्ञानान्न स्यात्सा ज्ञानिन: क्वचित्‌ ॥526॥
पुदलाद्भिन्नचिद्धाम्नो न मे व्याधिः कुतो भयम्‌ ।
व्याधिः सर्वा शरीरस्य नामूर्तस्येति चिन्तनम्‌ ॥527॥
यथा प्रज्वलितो वन्हि: कुटीरं दहति स्फुटम् ।
न दहति तदाकारमाकाशमिति दर्शनात्‌ ॥528॥
स्पर्शनादीन्द्रियार्थेषु प्रत्युत्पन्नेषु भाविषु ।
नादरो यस्य सोऽस्त्यथान्निभीको वेदनाभयात्‌ ॥529॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार अर्थवश आत्मा के अनेक गुण हैं, और दूसरा कोई चारा नहीं होने से एक चेतनावरण कर्म है ॥१०००॥ दर्शनावरण कर्म के विषय में भी यही क्रम जानना चाहिये, क्‍योंकि दर्शन भी आत्मा का एक गुण है इसलिए उसका आवरण करने वाला एक कर्म है उसमें फरक नहीं पड़ सकता ॥१००१॥ इसी प्रकार जीव का एक सम्यक्त्व गुण है । उसे जो कर्म सब प्रकार से मूर्छित करता है वह दर्शन-मोहनीय कहलाता है ॥१००२॥ यह कर्म ज्ञानावरण ओर दर्शनावरण के समान नहीं है, इसलिये इसका किसी अन्य कर्म में अंतर्भाव नहीं होता, क्‍योंकि यह उन दोनों आवरण कर्मों से भिन्न जाति का है ॥१००३॥ इसलिये यह सिद्ध होता है कि जिस प्रकार जीव का स्वभावतः एक ज्ञान गुण है उसी प्रकार जीव का स्वभावतः एक दर्शन गुण है ॥१००४॥ इसका नाम पृथक्‌ है, लक्ष्य और लक्षण पृथक् है, और दर्शन-मोहनीय कर्म पृथक् है फिर इस कर्म का किस युक्ति से अन्तर्भाव हो सकता है ॥१००५॥ इसी प्रकार जीव का प्रमाण सिद्ध एक चारित्र-गुण है, उसे जो कर्म मूर्च्छित करता है वह चारित्रमोहनीय कर्म है ॥१००६॥ पहले गुणों के समान जीव का एक वीर्य नाम का गुण है । उसे जो अन्तरित करता है वह अन्तराय कर्म है ॥१००७॥