
एतावदत्र तात्पर्य यथा ज्ञानं गुणाश्रितः ।
तथाऽनन्ता गुणा ज्ञेया युक्तिस्वानुभवागमात् ॥1008॥
न गुणः कोऽपि कस्यापि गुणस्यान्तर्भव: क्वचित् ।
नाधारोऽपि नाधेयो हेतुर्नापीह हेतुमान् ॥1009॥
किन्तु सर्वोऽपि स्वात्मीयः स्वात्मीयशक्तियोगतः ।
नानारूपा ह्यनेकेऽपि सता सम्मिलिता मिथ: ॥1010॥
गुणानां चाप्यनन्तत्वे वाग्व्यवहारगौरवात् ।
गुणाः केचित् समुद्दिष्टाः प्रसिद्धाः पुर्वसूरिभिः ॥1011॥
अन्वयार्थ : यहां पर इतना ही तात्पर्य है कि जिस प्रकार आत्मा का ज्ञान गुण है, उसी प्रकार युक्ति, स्वानुभव और आगम से अनन्त गुण जानने चाहिये ॥१००८॥ कोई भी गुण कहीं किसी दूसरे गुण में अंतर्भूत नहीं होता । न एक गुण दूसरे गुण का आधार है, न आधेय है, न हेतु है और न हेतुमान् ही है ॥१००९॥ किन्तु सभी गुण अपनी-अपनी शक्ति के योग से स्वतन्त्र हैं और वे विविध प्रकार के अनेक होकर भी पदार्थ के साथ परस्पर में मिले हुए हैं ॥१०१०॥ इस प्रकार यद्यपि गुण अनन्त हैं, तो भी पूर्वाचार्यों ने वचन व्यवहार के गौरव वश कुछ प्रसिद्ध गणों का ही निर्देश किया है ॥१०११॥