+ अवधि और मनःपर्ययज्ञान -
यत्पुनः क्वचित् कस्यापि सीमाज्ञानमनेकधा ।
मनः पर्ययज्ञानं वा तद्‌द्वयं भावयेत्‌ समम् ॥1012॥
तत्तदावरणस्यौच्चै: क्षयोपशमिकत्वतः ।
स्याद्यथालक्षिताद्भावात्‌ स्यादत्राप्यपरा गतिः ॥1013॥
अन्वयार्थ : जो कहीं किसी के अवधिज्ञान होता है वह अनेक प्रकार का है और मनःपर्ययज्ञान भी अनेक प्रकार का है । इन दोनों को समान समझना चाहिये ॥१०१२॥ दोनों ही अपने-अपने आवरण कर्म के प्रकृष्ट क्षयोपशम से होते हैं और यथा-लक्षित भाव के अनुसार इनकी अन्य गति भी होती है ॥१०१३॥