+ मतिज्ञान और श्रुतज्ञान -
मतिज्ञानं श्रुतज्ञानमेतन्मात्रं सनातनम्‌ ।
स्याद्वा तरतमैर्भावैर्यथाहेतुपलब्धिसात् ॥1014॥
अन्वयार्थ : मतिज्ञान और श्रुतज्ञान ये दोनों छद्मस्थ अवस्था में सदा रहते हैं और जैसी कारण-सामग्री मिलती है उसके अनुसार हीनाधिक हुआ करते हैं ॥१०१४॥