
अस्ति द्वेधावधिज्ञानं हेतोः कुतश्चिदन्तरात् ।
ज्ञानं स्यात्सम्यगवधिरज्ञानं कुत्सितोऽवधिः ॥1016॥
अस्ति द्वेधा मतिज्ञानं श्रुतज्ञानं च स्याद् द्विधा ।
सम्यङ् मिथ्याविशेषाभ्यां ज्ञानमज्ञानमित्यपि ॥1017॥
त्रिशु ज्ञानेषु चैतेषु यत्स्यादज्ञानमर्थतः ।
क्षायोपशमिकं तत्स्यान्न स्यादौदयिकं क्वचित् ॥1018॥
अस्ति यत्पुनरज्ञानमर्थादौदयिकं स्मृतम् ।
तदस्ति शून्यतारूपं यथा निश्चेतनं वपु: ॥1019॥
अन्वयार्थ : किसी कारण से अवधिज्ञान दो प्रकार का है । सम्यक् अवधि को ज्ञान कहते हैं और कुत्सित अवधि अज्ञान कहलाता है ॥१०१६॥ मतिज्ञान दो प्रकार का है और श्रुतज्ञान भी दो प्रकार का है । सम्यक् और मिथ्या रूप विशेषता के कारण ये दोनों ज्ञान और अज्ञान कहे जाते हैं ॥१०१५॥ इन तीनों ज्ञानों में जो अज्ञान है वह वास्तव में क्षायोपशमिक है । वह किसी भी हालत में औदयिक नहीं है ॥१०१८॥ और जो अज्ञान भाव है वह वास्तव में औदायिक जानना चाहिये । वह चेतना से रहित शरीर की तरह शून्यतारूप है ॥१०१९॥