
एतावतास्ति यो भावो दृङ्गमोहस्योदयादपि ।
पाकाच्चारित्रमोहस्य सर्वोऽप्यौदयिकः स हि ॥9020॥
न्यायादप्येवमन्येषां मोहादिघातिकर्मणाम् ।
यावांस्तत्रोदयाज्जातो भावोऽस्त्यौदयिकोऽखिल: ॥1021॥
अन्वयार्थ : इससे यह भी सिद्ध होता है कि दर्शनमोहनीय के उदय से और चारित्रमोहनीय के उदय से जो भाव होता है वह सब औदयिक है ॥१०२०॥ इसी न्याय से यह भी निष्कर्ष निकलता है कि मोहनीय से लेकर और दूसरे जितने भी घाति कर्म हैं उनके उदय से जो भाव होता है, वह सब औदयिक भाव है ॥१०२१॥