+ वैकृत भाव का खुलासा -
स यथानादिसन्तानात्‌ कर्मणोऽच्छिन्नधारया ।
चारित्रस्य दृशाश्च स्यान्मोहस्यास्त्युदयाच्चितः ॥1023॥
तत्रोल्लेखो यथासूत्रं दृङ्मोहस्योदये सति।
तत्त्वस्याप्रतिपत्तिर्वा मिथ्यापत्तिः शरीरिणाम ॥1024॥
अर्थादात्मप्रदेशेषु कालुष्यं दृग्विपर्ययात् ।
तत्स्यात्परिणतिमात्रं मिथ्याजात्यनतिक्रमात्‌ ॥1025॥
अन्वयार्थ : दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय कर्म की संतान अनादि काल से अच्छिन्न रूप से आ रही है । उसके उदय से आत्मा के यह वैकृत भाव होता है ॥१०२३॥ शास्त्रानुसार इसके विषय में ऐसा उल्लेख है कि दर्शन मोहनीय का उदय होने पर जीवों को तत्वों की सम्यक प्रतिपत्ति नहीं होती या विपरीत प्रतिपत्ति होती है ॥१०२५॥ अर्थात सम्यग्दर्शन की विपरीत परिणति हो जाने से आत्मप्रदेशों में कलुषता उत्पन्न हो जाती है जो आत्मा की मिथ्यात्वरूप एक परिणति है ॥१०२५॥