


तत्र सामान्यमात्रत्वादस्ति वक्तुमशक्यता ।
ततस्तल्लक्षणं वच्मि संक्षेपाद् बुद्धिपूर्वकम ॥1026॥
निर्विशेषात्मके तत्र न स्याद्वेतोरसिद्धता ।
स्वसंवेदनसिद्धत्वाद्युक्तिस्वानुभवागमै: ॥1027॥
सर्वसंसारिजीवानां मिथ्याभावो निरंतरम् ।
स्याद्विशषोपयोगीह केषान्चित् संज्ञिनां मन: ॥1028॥
तेषां वा संज्ञिनां नूनमस्त्यनवस्थितं मनः ।
कदाचित् सोपयोगि स्यान्मिथ्याभावार्थभूमिषु ॥1029॥
ततो न्यायागतो जन्तोर्मिथ्याभावो निसर्गत: ।
दृङ्मोहस्योदयादेव वर्तते वा प्रवाहवत् ॥1030॥
कार्य तदुदयस्योच्चै: प्रत्यक्षात्सिद्धमेव यत् ।
स्वरूपानुपलब्धिः स्यादन्यथा कथमात्मन: ॥1031॥
स्वरूपानुपलब्धौ तु बन्धः स्यात् कर्मणो महान् ।
अत्रैवं शक्तिमात्रं तु वेदित्तव्यं सुदृष्टिभि: ॥1032॥
प्रसिद्धैरपि भास्वद्भिरलं दृष्टान्तकोटिभि: ।
अत्रेत्थमेवमेवं स्थादलङ्घ्या वस्तुशक्तयः ॥1033॥
सर्वे जीवमया भावा दृष्टान्तो बन्धसाधकः ।
एकत्र व्यापक: कस्मादन्यत्राव्यापक: कथम् ॥1034॥
अथ तत्रापि केषाश्चित् संज्ञिनां बुद्धिपूर्वक: ।
मिथ्याभावो ग्रहीताख्यो मिथ्यार्थाकृतिसंस्थितः ॥1034॥
अर्थादेकविध: स स्याज्जात्तेरनतिक्रमादिह |
लोकासंख्यातमात्र: स्यादालापापेक्षयापि च ॥1036॥
अन्वयार्थ : वह मिथ्यात्व सामान्यमात्र है इसलिये उसका कथन करना शक्य नहीं है, अतः संक्षेप में बुद्धिपूर्वक होनेवाले मिथ्यात्व का लक्षण कहते हैं ॥१०२६॥ सामान्य मिथ्यात्व की हेतु से सिद्धि नहीं की जा सकती ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि वह स्व-संवेदन प्रत्यक्ष से सिद्ध है । तथा युक्ति, स्वानुभव और आगम से भी उसकी सिद्धि होती है ॥१०२७॥ सब संसारी जीवों के निरन्तर मिथ्याभाव रहता है । तथापि किन्हीं संज्ञी जीवों का मन इस विषय में विशेष उपयोगी होता है ॥१०२८॥ अथवा उन संज्ञी जीवों का मन नियम से अनवस्थित रहता है अतः वह मिथ्या-भावों के विषय में कदाथित् उपयोगी होता है ॥१०२९॥ इसलिये यह बात न्याय से प्राप्त है कि संसारी जीव के मिथ्याभाव स्वभाव से होता है । अथवा दर्शन-मोहनीय के उदय से ही उसका प्रवाह चालू है ॥१०३०॥ दर्शन-मोहनीय के उदय का कार्य प्रत्यक्ष से ही सिद्ध है । अन्यथा आत्मा को स्वरूप की अनुपलब्धि कैसे होती है ॥१०३९॥ और स्वरूप की अनुपलब्धि होने पर कर्म का महान् बन्ध होता है । इसमें ऐसी शक्ति है यह बात सम्यक दृष्टियों को जान लेना चाहिये ॥१०३२॥ इस विषय में प्रसिद्ध और वस्तु को स्पष्ट करनेवाले करोड़ों दृष्टान्तों के देने से क्या प्रयोजन, क्योंकि मिथ्यात्व का स्वभाव ही ऐसा है, इसमें जरा भी संदेह नहीं । यह स्पष्ट है कि वस्तु की शक्तियां अलंघ्य होती हैं ॥१०३३॥