
अथ तत्रापि केषाश्चित् संज्ञिनां बुद्धिपूर्वक: ।
मिथ्याभावो ग्रहीताख्यो मिथ्यार्थाकृतिसंस्थितः ॥1035॥
अर्थादेकविध: स स्याज्जात्तेरनतिक्रमादिह ।
लोकासंख्यातमात्र: स्यादालापापेक्षयापि च ॥1036॥
आलापोऽप्येकजातिर्यो नानारूपोऽप्यनेकधा ।
एकान्तो विपरीतश्च यथेत्यादिक्रमादिह ॥1037॥
अथवा शक्तितोऽनन्तो मिथ्याभावों निसर्गत: ।
यस्मादेकैकमालापं प्रत्यनन्ताश्च शक्तय: ॥1038॥
जघन्यमध्यमोत्कृष्टभावैर्वा परिणामिनः ।
शक्ति भेदात्क्षणम् यावदुन्मज्जन्ति पुनः पृथक् ॥1039॥
कारु कारु स्व कार्यत्वाद्धन्धकार्यं पुन: क्षणात् ।
निमज्जन्ति पुनश्चान्ये प्रोन्मज्जन्ति यथोदयात् ॥1040॥
अन्वयार्थ : वहाँ भी किन्हीं संज्ञी-जीवों के बुद्धिपूर्वक ग्रहीत नाम का मिथ्याभाव होता है जो पदार्थों के मिथ्या आकार को लिये हुए स्थित है ॥१०३५॥ वास्तव में वह अपनी जाति को न त्यागते हुए एक प्रकार का है, फिर भी आलाप-विशेष की अपेक्षा वह असंख्यात-लोक-प्रमाण है ॥१०३६॥ उसमें भी जो आलाप एक जाति का है वह भी नानारूप होकर अनेक प्रकार का है । जैसे एकान्त मिथ्यात्व और विपरीत मिथ्यात्व आदि । इसी प्रकार और भाव भी जानने चाहिये ॥१०३७॥ अथवा शक्ति की अपेक्षा मिथ्याभाव स्वभाव से अनन्तरूप है, क्योंकि प्रत्येक आलाप के प्रति अनन्त शक्त्यंश होते हैं ॥१०३८॥ जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट रूप से शक्ति-भेद से परिणमन करते हुए वे भाव प्रत्येक समय में प्रथक् रूप से उदित होते हैं और अपना कार्य होने से बन्ध कार्य करके अस्त हो जाते हैं । फिर उदयानुसार अन्य भाव उदित होते हैं ॥१०३९-१०४०॥