
बुद्धिपूर्वकमिथ्यात्वं लक्षणाल्लक्षितं यथा ।
जीवादीनामश्रद्धानं श्रद्धानं वा विपर्यात् ॥1041॥
सूक्ष्मान्तरितदूरार्था: प्रागेवात्रापि दर्शिताः ।
नित्यं जिनोदितैर्वाक्यैर्ज्ञातुं शक्या न चान्यथा ॥1042॥
दर्शितेष्वपि तेषूच्चैर्जैनै: स्याद्वादभि: स्फुटम् ।
न स्वीकरोति तानेव मिथ्याकर्मोदयादपि ॥1043॥
ज्ञानानन्दौ यथा स्यातां मुक्तात्मनो यदन्वयात् ।
विनाप्यक्षशरीरेभ्यः प्रोक्तमस्त्यस्ति वा न वा ॥1044॥
स्वतःसिद्वानि द्रव्याणि जीवादीनि किलेति षट् ।
प्रोक्तं जैनागमे यत्तत्स्याद्वा नेच्छेदनात्मवित् ॥1045॥
नित्यानित्यात्मकं तत्वमेकं चैकपदे च यत् ।
स्याद्वा नेति विरुद्धत्वात् संशयं कुरुते कुदृक् ॥1046॥
अप्यनात्मीयभावेषु यावन्नोकर्मकर्मसु ।
अहमात्मेति बुद्धिर्या दृङ्मोहस्य विजृम्भितम् ॥1047॥
अदेवे देवबुद्धि: स्यादगुरौ गुरुधीरिह ।
अधर्मे धर्मवज्ज्ञानं दृङ्मोहस्यानुशासनात् ॥1048॥
धनधान्यसुताद्यर्थ मिथ्यादेवं दुराशयः ।
सेवते कुत्सितं कर्म कुर्याद्वा मोहशासनात् ॥1049॥
अन्वयार्थ : बुद्धिपूर्वक मिथ्यात्व का जो लक्षण किया गया है वह इस प्रकार है कि जीवादि पदार्थों का श्रद्धान नहीं होना या उनका विपरीत श्रद्धान होना ॥१०४१॥ सूक्ष्म, अन्तरित और दूरवर्ती पदार्थ इसी ग्रन्थ में पहले दिखला आये हैं । उनका ज्ञान जिनदेव के द्वारा कहे गये वचनों से किया जा सकता है, अन्य प्रकार से नहीं ॥१०४२॥ यद्यपि स्याद्वादी जैनाचार्यों ने उनको अच्छी तरह स्पष्ट रीति से दिखलाया है, तो भी मिथ्यादृष्टि जीव मिथ्यात्व कर्म के उदय-वश उन्हें नहीं स्वीकार करता है ॥१०४३॥ इसी प्रकार वह विचार करता है कि -- शास्त्र में कहा है कि ज्ञान और आनन्द इन्द्रिय और शरीर के बिना भी अन्वय रूप से मुक्तात्मा के पाये जाते हैं सो यह ठीक है कि नहीं है ॥१०४४॥ वह यह भी सोचता है कि जीवादिक छह-द्रव्य स्वतःसिद्ध हैं, यह जो शास्त्र में कहा गया है वह ठीक है या
नहीं है ॥१०४५॥ इसी प्रकार पदार्थ नित्यानित्यात्म है, ऐसा जो कहा गया है सो एक पदार्थ में परस्पर विरोधी होने से वे रहते है या नहीं रहते ऐसा भी वह संशय करता है ॥१०४६॥ अनात्मीय भाव कर्म और नोकर्म में 'मैं आत्मा हूं' ऐसी बुद्धि होती है वह दर्शन-मोहनीय की करामात है ॥१०४७॥ इसी प्रकार इसके दर्शन-मोहनीय के उदय से अदेव में देव-बुद्धि, अगुरु में गुरु-बुद्धि और अधर्म में धर्म-बुद्धि होती है ॥१०४८॥ मिथ्यादृष्टि जीव मोहवश घन, धान्य और पुत्रादि की प्राप्ति के लिये मिथ्या देवों की उपासना करता है और नाना प्रकार के कुत्सित कर्म करता है ॥१०४९॥