+ सारांश -- बंध के हेतु मोहनीय से होनेवाले भाव -
सिद्धमेतन्नु ते भावाः प्रोक्ता येऽपि गतिच्छलात् ।
अर्थादौदयिकास्तेऽपि मोहद्वैतोदयात्परम्‌ ॥1050॥
यत्र कुत्रापि वान्यत्र रागांशो बुद्धिपूर्वक: ।
स स्याद्-द्वैविध्यमोहस्य पाकाद्वान्यतमोदयात्‌ ॥1051॥
एवमौदयिका भावाश्चत्वारो गतिसंश्रिताः ।
केवलं बन्धकर्तारो मोहकर्मोदयात्मकाः ॥1052॥
अन्वयार्थ : इससे यह सिद्ध होता है कि गति के नाम निर्देश द्वारा जो भाव कहे गये हैं, वे औदयिक तो हैं तो भी वे वास्तव में दर्शन-मोहनीय और चरित्र-मोहनीय के उदय से ही औदयिक हैं ॥१०५०॥ जहां कहीं भी बुद्धिपुर्वक रागांश होता है वह या तो दोनों प्रकार के मोहनीय के उदय से होता है या उनमें से किसी एक के उदय से होता है ॥१०५१॥ इस प्रकार गति के आश्रय से चार औदयिक भाव होते हैं । किन्तु बन्ध के करनेवाले केवल मोहनीय कर्म के उदय से होनेवाले भाव हैं ॥१०४२॥